'अनेक' एक्टर आयुष्मान खुराना बोले- पूर्वोत्तर भारत में मातृसत्तात्मक सोच को अपनाया

रूना आशीष| पुनः संशोधित शुक्रवार, 27 मई 2022 (16:13 IST)
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मैं जब कॉलेज था तब हमारे बैंड में एक लड़का हुआ करता था, जो मणिपुर से था। कई बार वो मुझे मैंयंग बुलाया करता था, जब मैंने पूछा इस शब्द का क्या मतलब होता है? उसने कहा बाहरी व्यक्ति और मैंने उससे पूछ लिया बाहरी क्यों बुलाते हो तो मेरे उस दोस्त ने मुझे बताया कि जब बाकी के लोग हमें बाहरी बुलाते हैं तो हम भी दूसरे लोगों को बाहरी बुलाने लगे हैं।

उससे बात करते-करते समझ में आया कि इन लोगों को बहुत ज्यादा भेदभाव का सामना करना पड़ता है। चंडीगढ़ में जहां पर मैं अपना कॉलेज कर रहा था वहां पर एक छोटा सा समूह बन गया है, पूर्वोत्तर भारत का। और इन सभी लोगों को बहुत ज्यादा भेदभाव से गुजरना पड़ा है। जो मेरे निर्देशक अनुभव सिन्हा उनके जो योगा गुरु है, वह खुद नागालैंड के हैं। ऐसे कई लोग हैं हमारे जिंदगी में जो हम से जुड़े हैं और उन्हें इस तरीके के भेदभाव का सामना करना पड़ा है।
मुझे ऐसा लगता है कि पूर्वोत्तर भारत बहुत ही सुंदर प्रदेश है। बहुत ही सुंदर जगह है। पूरे भारत में जहां पर पितृसत्तात्मक सोच ही चलती है वहीं पर पूर्वोत्तर भारत में मातृसत्तात्मक सोच को अपनाया जाता है। वहां पर महिलाएं दुकान में बैठकर काम करती हैं। बाहर काम करने जाती हैं और जो पिता होते हैं, वह बच्चों को घर में बैठकर संभालते हैं। और इस सोच पूरे देश से अलग है। अब साथ ही साथ में यह भी कहना चाहूंगा कि पूरा देश जब इन पूर्वोत्तर भारतीयों को अपना लेगा तब हमारी जिंदगी में कितनी तब्दीलियां आ जाएगी। हमारे विचारों में कितना अंतर आ जाएगा।
यह कहना है आयुष्मान खुराना का जो कि अपनी फिल्म 'अनेक' के साथ सामने आए है। आयुष्मान की यह फिल्म पूर्वोत्तर भारत में रहने वालों और उनके विचारों पर बनाई गई एक फिल्म है। मीडिया से रूबरू होते हुए आयुष्मान ने कई बातों का खुलासा किया।

अपनी निजी जिंदगी में कोई भेदभाव हुआ है या नहीं। इस सवाल का जवाब देते हुए आयुष्मान ने कहा कि एक बार मैं और मेरे साथ कुछ लोग थे। हम लोग बाहर किसी देश में थे। वहां पर जिस होटल में हम लोग गए थे हम अपने इस इंतजार में थे कि हमें कब कोई टेबल मिलेगा वह होटल खचाखच भरा हुआ था। तब होटल के अंदर से शख्स आया, उसने हमें टेबल ना देते हुए किसी अमेरिकन को टेबल पहले दे दी। तो यह भेदभाव मैंने अपनी जिंदगी में देखा और होता यह है कि जो भेदभाव कर रहा होता है उसे समझ में ही नहीं आता है कि वह अनजाने में उसने किसी के साथ गलत किया है या अंतर कर दिया है। लेकिन जो इस महसूस कर रहा होता है वह इस भेदभाव को कभी नहीं भूल पाता।
शायद आप बड़े ही लकी रहे हैं जो आपने फिल्मी दुनिया में भी भेदभाव का सामना नहीं किया हो।

पता नहीं शायद इसलिए, क्योंकि मैंने हमेशा नए निर्देशक निर्माताओं के साथ काम किया है। यह वह निर्माता-निर्देशक थे जो खुद किसी फिल्मी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थे तो हम जब एक साथ आए और फिल्म बना रहे थे तब दिमाग में यही था कि चलो एक दूसरे की मदद करते हुए काम करते हैं। चाहे वह स्क्रिप्ट राइटर हो या कहानीकार हो या कोई भी हो। हम ऐसे ही लोग एक साथ जुड़ते चले गए।

इस दौरान आप पूर्वोत्तर भारत में कहां-कहां घूमे?
मैं तो जब सूट करने जाता हूं तो शेड्यूल से एक दो दिन पहले ही चला जाता हूं। मुझे बहुत अच्छा लगता है कि मैं जहां शूट कर रहा हूं, वहां के लोगों से मिल सकूं। वहां की बातें जान सकूं और उस जगह से एकसार हो सकूं। इस वजह से आपके परफॉर्मेंस में भी फर्क पड़ता है। मैं वहां पर काजीरंगा घूमने निकल जाता था। वहां पर सफारी भी बहुत की। अपने ड्राइवर से बातें करता रहता था कि उसकी जिंदगी कैसे चलती है, वह क्या-क्या करता है। वहां रहने वाले लोगों के साथ क्रिकेट भी खेला। यह मेरा मेथड है एक्टिंग करने का।
आपको लगता है यह जो रियालिटी शो है, उसमें कई बार पूर्वोत्तर भारत से कई बच्चे आते हैं डांस या सिंगिंग के जरिए। उसकी वजह से लोगों की सोच में खुलापन आया है।
बहुत ज्यादा अंतर आए हैं। चाहे वह स्पोर्ट्स हो, चाहे वह रियालिटी शो, फिल्म ही क्यों न हो, ऐसे लोगों ने जब जज्बा दिखाया है तो बाकी के लोगों की सोच में भी फर्क आया है। मुझे ऐसा लगता है कि जब आप दूसरे लोगों से जुड़ना चाहते हैं तो आपको वह जज्बा दिखाना पड़ेगा। आपको अपने टैलेंट को सामने लाना पड़ेगा ताकि लोग आपको देखें और वैसे भी यह सारे ही प्लेटफार्म बहुत अच्छा काम करते हैं जहां अलग अलग तरीके के और अलग अलग संस्कृति के लोग एक ही साथ एक ही मंच पर आकर बातचीत कर सकें अपना टैलेंट दिखा सकें।
चाहे वह मैरीकॉम जैसा कोई व्यक्ति हो या बाइचुंग भूटिया हो या सुनील छेत्री हों। उन्होंने अपना नाम किया है, टैलेंट दिखाया है। इस फिल्म में सवाल यह है कि क्या जरूरी है कि अपना टैलेंट दिखाया जाए और तभी लोग आपको अपनाएंगे। जो लोग अपना टैलेंट नहीं दिखा पाते हैं या उनकी सोच ऐसी नहीं होती है? क्या उन्हें अपने साथ नहीं मिलाना चाहिए।

आप कई फिल्में ऐसी रही है जिसको करने के बाद या तो कहीं कोई एनजीओ ने बात उठाई हो या फिर कहीं कोई राजनीतिक बात सामने आ गई। जब आप फिल्म रिलीज होने के बाद यह सब चीजें पढ़ते हैं और उस उनका प्रभाव देखते हैं तो आप क्या सोचते हैं?
कुछ एक बात मैं कहना चाहूंगा। एक तो मैं एक्टर हूं। जब आप मुझसे निजी तौर पर मिलेंगे तो मैं ऐसी कोई बात नहीं कहूंगा जिससे आपका और मेरा कोई टकराव होता है। लेकिन जब मैं एक्टिंग कर रहा हूं तो मेरी ऐक्टिंग के जरिए अगर लोगों के सोच में या मन में टकराव आता है तो मैं वह देखने और सहन करने के लिए भी तैयार रहता हूं। मेरा काम है एक्टिंग करना। मेरा काम है अपने हुनर के जरिए अपने दिल की बात बताना।

वैसे भी लोग आपको आपके राजनीतिक सोच की वजह से पसंद नहीं करते हैं। वह आपको आपके काम की वजह से तो जो भी मेरे दिमाग में आता है, मैं वह शायद ट्वीट ना करूं या सोशल मीडिया पर नहीं पोस्ट करूं, लेकिन मेरी उस सोच को मैं एक्टिंग के जरिए वैसी फिल्म करने के साथ लोगों के सामने रख देता हूं। अब एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी है या फिर आर्टिकल 15 फिल्म कर देने के बाद अभी तक मेरे सामने कई बार सच्चाई आती है और मैं सोचता हूं कि यह सब चीजें हो रही है। एक बात ही होती है कि आप कोई फिल्म करते हैं। उस विषय पर फिल्म रिलीज के दौरान बातचीत होती है। लेकिन मैं उस फिल्म के विषय पर 6 महीने तक काम कर चुका हूं और फिर भी मैं यह कहता हूं कि मैं उस विषय पर पूरी जानकारी आज भी नहीं रखता।

मिसाल के तौर पर मुझे आज भी पूर्वोत्तर भारत की हर चीज के बारे में जानकारी नहीं होती है। जब ऐसे पोस्ट पढ़ता हूं और यह सब देखता हूं तो मुझे लगता है कि मैं आज भी फिल्म रिलीज होने के बाद भी अपनी उस फिल्म और उस फिल्म की सच्चाईयों से जुड़ी बातों को सीख रहा हूं। मेरा ज्ञान बढ़ता जाता है।



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