शमशाद बेगम : मेरे मरने के बाद दुनिया को बताना कि मैं चली गई...


को मुंबई में मशहूर गायिका का हो गया था। उनकी अंत्येष्टि चर्चा का विषय रही थी। उनके जनाजे में सिर्फ कुछ मित्र मौजूद थे। यह फिल्म दुनिया का कड़वा सच है।


किंतु हम सब जानते हैं कि कुछ तो
था उस रवेदार आवाज में कि एकबारगी ठिठक कर सुनने का मन हो ही जाता है ।

भोला सा प्रेम इजहार हो या खिलखिलाती शोखी। शमशाद की आवाज हर अभिनेत्री के दिल की आवाज बन कर पर्दे पर खनकी। उनके गाए गीतों में एक तरफ खट्टी-मीठी गंवई महक थी तो दूसरी तरफ उस वक्त की आधुनिक फैशनेबल लड़की की मस्ती भरी अदा भी।

शमशाद के निधन के बाद उनकी बेटी उषा ने कहा था कि उनके लिए कुछ भी कहना मेरे लिए असंभव है मैं शब्दों में नहीं बता सकती कि वह कितनी महान हस्ती थी। मेरी मां मुझसे कहती थीं कि मेरी मौत के बाद मेरे अंतिम संस्कार के बाद ही दुनिया को बताना कि मैं अब जा चुकी हूं।... और सुनो, मैं कहीं नहीं जाउंगी जहां से आई थी वहीं वापस जा रही हूं मैं हमेशा सबके साथ हूं।
वाकई वे हमारे साथ अपनी महकती-खनकती आवाज के रूप में हमेशा रहेगीं। उन्हें एकांत में सुनने व पसंद करने वालों के लिए सिर्फ तीन गीत पर्याप्त हैं- 'मेरे पिया गए रंगून', 'कजरा मुहब्बत वाला' और 'होली आई रे कन्हाई रंग छलके, सुना दे जरा बांसुरी.... और जिन्होंने शमशाद को कभी डूबकर नहीं सुना उनके लिए बस 'लेके पहला-पहला प्यार, भर के आंखों में खुमार' गीत ही ऐसा है जो शर्तिया उनका दीवाना बनाए बिना नहीं छोड़ेगा।

नई पीढ़ी के तमाम धूमधड़ाम वाले गीतों के बीच उनका मस्तमौला गीत 'आना मेरी जान..संडे के संडे' आज भी जुबान पर आते ही हाथ-पैरों को मजबूर कर देता है थिरकने के लिए।

याद कीजिए जब उन्होंने गाया 'बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गांव रे..पीपल झूमे मोरे अंगना, ठंडी-ठंडी छांव रे... तब कौन ऐसा होगा जिसके ख्वाबों में सलोने से गांव का सौंधा-सा घर-आंगन किसी फिल्म की तरह नहीं गुजरा...!

और जरा याद कीजिए 'तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे, अजी हां हम भी देखेंगे... घड़ी भर को तेरे नजदीक आकर हम भी देखेंगे... सुनकर कितने दिल ऐसे होंगे जिनके नजदीक शमशाद नहीं पहुंची... उनकी आवाज का शहद अतिरिक्त मीठा नहीं बल्कि कहीं अधिक गहरा और ताजातरीन लगता है...उन्हें आप महज कानों से सुन ही नहीं सकते। उनकी आवाज आपके दिल और दिमाग को सुनने के लिए, या कहें कि 'संपूर्णता' और 'सजगता' से सुनने के लिए सुप्रेरित करती हैं।

इस तरह के सुंदर भाषिक अलंकरण किसी-किसी आवाज पर ही जेहन में मोती से बिखरते हैं..समझ में नहीं आता कि यह चुनें या वह चुनें। शमशाद के गानों में संगीत के प्रति उनकी तल्लीनता स्पष्ट समझ में आती है। जब उनकी स्वर लहरियां संगीत के पैरामीटर से बाहर आने की प्रबल संभावना को देखते हुए भी नियम नहीं तोड़ती और एक मीठे अनुशासन को निभाती है तो सहज ही सुहाना सा लाड़ उमड़ आता है उनकी आवाज के प्रति..।

कभी आर-कभी पार लागा तीरे नजर सैंया घायल किया है तूने मोरा जिगर... इस गाने की हल्की सी लरज एक ऐसा माहौल हमारे दिल में रचती है कि शब्द-शब्द पर हम झूम जाएं...

पूछिए उस नारी के कलेजे से कि कैसे रोक पाई वह अपनी बेसाख्ता रूलाई को जब बिदाई के वक्त उसने सुना था, छोड़ बाबुल का घर आज पी के नगर...

बहरहाल, हम सभी को एक दिन जाना है लेकिन कुछ आवाजें खामोश होने पर खामोश नहीं रहती। मन में लगातार महकती है और उनके 'जाने' के बाद तो मन को रूला-रूला कर चहकती है.. अपने गाए हर गीत को याद करने के लिए मजबूर कर-कर के खनकती है। शमशाद बेगम उसी आवाज का नाम है।



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