गोविंदा : आदत से मजबूर

Govinda
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कुत्ते की दुम की तरह हर इंसान में कुछ ऐसी टेढ़ी आदतें होती हैं, जिन्हें लाख कोशिशों के बावजूद वह सुधार नहीं पाता। अब गोविंदा का मामला ही लीजिए।

जब फूहड़ता और अश्लीलता को दर्शकों ने नकार दिया, फार्मूला फिल्में पिटने लगीं तो गोविंदा के अभिनय की दुकान चलना कम हो गई। मौका देख उन्होंने राजनीति का दामन थाम लिया। लेकिन फिल्मी दुनिया के ग्लैमर का मोह आसानी से नहीं छूटता। अपनी वापसी के लिए उन्होंने प्रयत्न शुरू किए।

गोविंदा ने सबको आश्वस्त किया कि वे बदल गए हैं और समय की पाबंदी और अनुशासन का पाठ उन्होंने सीख लिया है। सलमान की वजह से उन्हें ‘पार्टनर’ में काम मिला और फिल्म के सफल होने के बाद निर्माताओं ने गोविंदा पर फिर भरोसा करना शुरू किया।

गोविंदा को जैसे ही विश्वास होने लगा कि उनके पैर अब फिर से जम रहे हैं, उन्होंने लेटलतीफी फिर शुरू कर दी। सूत्रों के मुताबिक यह किस्सा आए दिन दोहराया जाने लगा।

उनकी यह आदत उन्हें फिर एक बार डुबो सकती है क्योंकि कई कॉरपोरेट्स जो गोविंदा को लेकर फिल्म बना रहे थे उन्होंने अपनी उन फिल्मों को बंद करना शुरू कर दिया है। इसका सीधा असर गोविंदा के करियर पर पड़ेगा।

अपने स्वर्णिम दिनों में गोविंदा सेट पर शूटिंग के लिए बहुत देरी से आते थे। आते भी थे तो चंद घंटे की शूटिंग के बाद चले जाते थे। असुरक्षा की भावना की वजह से उन्होंने ढेर सारी फिल्में साइन कर ली थी और समय उनके पास कम था।

गोविंदा ने कई निर्माताओं को खून के आँसू रुलाए हैं, लेकिन वे स्टार थे इसलिए निर्माता उन्हें बर्दाश्त करते रहे। वह दौर अलग था। जो स्टार जितनी देरी से सेट पर आता था, उतना बड़ा स्टार माना जाता था।

पिछले दिनों प्रदर्शित ‘मनी है तो हनी है’ के निर्देशक गणेश आचार्य से भी गोविंदा का विवाद गहरा गया है। इस फिल्म में गणेश ने अपनी दोस्ती निभाते हुए गोविंदा को नायक बनाया। खबरों के मुताबिक ‍शूटिंग के दौरान गोविंदा ने सुपर निर्देशक बनने की कोशिश की। नतीजन दोनों के संबंध खराब हो गए और बोलचाल बंद हो गई।

समय ताम्रकर|
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गोविंदा की इन हरकतों की वजह से उन्हें ‍लेकर फिल्म बनाने वाले निर्माता सोच-विचार कर ही निर्णय करेंगे। गोविंदा उम्र के उस दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ आदत सुधारने में बड़ी तकलीफ होती है।



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