अफगानिस्तान डायरी: काबुल में बरसती गोलियां और कंधार के स्वीमिंग पूल में डुबकिया लगाते तालिबान लड़ाके

BBC Hindi| पुनः संशोधित शनिवार, 21 अगस्त 2021 (08:03 IST)
मलिक मुदस्सिर, बीबीसी न्यूज़, क़ाबुल
क़ाबुल में गुरुवार को लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ें सुनाई देती रहीं। ये फ़ायरिंग विदेशी दूतावासों की तरफ जाने वाली सड़क पर मौजूद सैकड़ों लोगों को तितर-बितर करने और एयरपोर्ट के अंदर जाने की कोशिश करने वालों को रोकने के लिए की जा रही थी।
मुझे लगता है कि आशुरा की छुट्टी के बाद जब दफ़्तर और कारोबार खुलेंगे तभी यह पता चल पाएगा कि नई व्यवस्था में कौन किस हद तक आज़ाद होगा।

19 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस भी था। यहां इसका जश्न तो जाहिरी तौर पर देखने को नहीं मिला, लेकिन हर जगह से राष्ट्रीय ध्वज को हटाने और इस्लामिक अमीरात का झंडा लगाए जाने को बहुत से लोग स्वीकार करने करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसे लेकर भी प्रदर्शन हो रहे थे और वहां भी फ़ायरिंग की गई।
कल जलालाबाद में प्रदर्शनकारी निकले थे तो उन पर भी फ़ायरिंग की गई थी। आज भी लोग क़ाबुल और कुछ अन्य इलाकों में प्रदर्शन करने के लिए निकले हैं। इनमें महिलाएं, पुरुष और युवा शामिल थे, जिन्होंने बड़े और छोटे साइज़ के राष्ट्रीय झंडे लिए हुए थे।

तस्वीर और वीडियो से गुरेज़
हालांकि, दो दिन पहले के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने पत्रकारों से कहा था कि आप अपना काम निष्पक्ष रूप से कर सकते हैं, लेकिन आज दूसरा दिन है और क्षेत्र में तालिबान की संख्या पिछले दो दिनों के मुक़ाबले बढ़ गई है। मैं कैमरा निकालता हूं, तो तालिबान लपक कर हमारे पास आते हैं, हमें तस्वीरें और वीडियो बनाने से रोक रहे हैं। गुपचुप तरीक़े से कुछ वीडियो और फोटो लिए गए, तो ठीक वरना नहीं।
क़ाबुल हो, हो या कोई अन्य शहर, यहां मैंने अपने कैमरे से कई बार डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट्स का फिल्मांकन किया हैं। इसलिए इस बार फिल्मांकन किये बिना, मैं अपने मोबाइल फ़ोन का कैमरा बंद कर देता, कैमरा और ट्राइपॉड उठा कर, काम करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जा कर, काम करने की कोशिश करता, और अंत में अपने निवास स्थान पर लौटते समय मैं काफी कुढ़न का शिकार हो रहा था।
अभी तक तो तालिबान की सेल्फी और नरम अंदाज से ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद वे तस्वीरों के मामले में नरमी बरतेगें, लेकिन क़ाबुल से कंधार तक यहां के राजमार्गों और इमारतों पर लगी तस्वीरों और मूर्तियों का क्या होगा, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।

कंधार की तबाही
कंधार से आने वाले एक व्यक्ति ने हमें कंधार की तबाही, वहां होने वाले बदलाव और अपनी यात्रा के बारे में बताया।
कुछ महीने पहले मैं ख़ुद कंधार गया था। अब तो मुझे ठीक से याद भी नहीं है कि मैं कितनी बार वहां गया हूँ, शायद 25 या उससे अधिक बार। मैं पहली बार 2004 में एक निजी संस्था के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए कंधार गया था।

उसी साल, मैंने कंधार के शहीद चौक में अफ़ग़ान बॉक्स कैमरों की एक क़तार देखी थी। कंधार में बिजली बहुत बाद में आई थी, लोग उन दिनों फ़ोटो लेने के लिए 1825 में ईजाद हुए कैमरे का इस्तेमाल करते थे।
2019 में, जब मैं इस चौक से गुजऱ रहा था, मैंने एक फ़ोटोग्राफ़र की दुकान के बाहर वही अफ़ग़ान बॉक्स कैमरा देखा, तो मैं तुरंत कार से उतरा और मैंने डेढ़ सौ डॉलर में वो कैमरा ख़रीद लिया। यह शायद उस चौक में मौजूद आख़िरी कैमरा था। दुकानदार ने हैरान होते हुए मुझसे पूछा, "आप इसे क्यों ख़रीद रहे हैं? आप इसका क्या करेंगे?" मैंने कहा, "मैं इसे अपने ड्राइंग रूम में रखूंगा।" तो वह और भी हैरान हो गया।
ख़ैर, मुझे नहीं पता कि आज उस चौक में किसी फ़ोटोग्राफ़र की दुकान खुली है या नहीं या आगे कभी खुल सकेगी भी या नहीं। हालांकि सुनने में आया है कि आज जब कंधार में राष्ट्रध्वज को लेकर विरोध किया जा रहा था, तो कुछ पत्रकार भी हिंसा का शिकार हो गए हैं।

पटरी पर लौट रही है ज़िंदगी
कंधार के एक स्थानीय निवासी गुल मोहम्मद (बदला हुआ नाम) ने हमें बताया कि पहले की तुलना में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन एक दिन पहले लोग शहर में फ़ायरिंग होने की बात कह रहे थे। कुछ लोग बगराम जेल से आए थे और फ़ायरिंग कर रहे थे।
गुल मोहम्मद कहते हैं, ''वहां बहुत भीड़ हुआ करती थी, बहुत सारे तालिबान थे जो मोटरसाइकिलों पर शहर में घूमते थे। कुछ लोग तो आम नागरिकों के घर लूट रहे थे, लेकिन अब इसमें सुधार हुआ है। गवर्नर के प्रवक्ता ने कहा कि "हमने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है और हम उन्हें सजा देंगे।"

हालांकि गुल मोहम्मद का कहना है कि ज़्यादातर दुकानें अभी भी बंद हैं। कंधार में, स्कूल में गर्मी की छुट्टियां हैं, लेकिन ट्रैफिक पुलिस सड़कों पर आ गई है और सरकारी कार्यालयों, जैसे कि अस्पताल और पानी की आपूर्ति, ने काम शुरू कर दिया है, लेकिन गवर्नर हाउस और कस्टम कार्यालय अभी भी बंद है। लोग परेशान हैं, शायद इसलिए भी कोई काम पर नहीं आ रहा है।
उन्होंने बताया कि बहुत से सरकारी अधिकारी शहर छोड़कर चले गए थे, लेकिन पिछले दो दिनों में कुछ लोग वापस लौट आए हैं।

हमने गुल मोहम्मद से पूछा कि क्या वह हमेशा के लिए कंधार छोड़कर आ गए हैं। उन्होंने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा, "मैं अभी तो किसी काम से क़ाबुल आया हूं, लेकिन सच कहूं तो मुझे अब यहां रहने से डर लगता है। पता नहीं नई व्यवस्था कैसी होगी।"

उन्होंने बताया, कि 'फिलहाल महिलाएं बिना बुर्का पहने बाज़ार में घूम रही हैं, मास्क पहनती हैं, लेकिन हमें भविष्य के बारे में चिंता है। हर कोई यही सोच रहा है। इसलिए बहुत से लोग अफगानिस्तान छोड़ रहे हैं। मैं ख़ुद यहां नहीं रहना चाहता।"
गुल मोहम्मद का कहना है कि महीने भर के युद्ध के दौरान हर दिन उन्होंने आम नागरिकों की लाशें देखी हैं।

तालिबान ने पूर्व और दक्षिण में इमारतों को तबाह कर दिया है, घरों को शेल्टर के रूप में भी इस्तेमाल किया है। शहर की एक महिला ने मुझे बताया है, कि तालिबान ने कहा कि अगर पांच मिनट में घर खाली नहीं किया, तो मैं तुम्हें मार डालूंगा। उन्होंने घरों को तबाह कर दिया, सरकार उनके ख़िलाफ़ वायु सेना का प्रयोग कर रही थी, इसकी वजह से भी घर तबाह हुए हैं।"
गुल मोहम्मद का कहना है कि साल 2001 से अब तक आम नागरिकों ने ही इसकी क़ीमत चुकाई है।

गुल मोहम्मद बताते हैं, कि क़ाबुल तक की उनकी यात्रा के बारे में एक अच्छी बात यह रही, कि वह रात 10 बजे कंधार से निकले और सुबह 7 बजे पहुंचे, लेकिन रास्ते में ऐसी कोई घटना नहीं हुई कि उनका सामना डाकुओं से हुआ हो, जो यहां पहले आम बात थी। हां, दो चौकियां थीं जहां तालिबान ने पूछा कि कहां जाना है और फिर जाने दिया।
पिछले दौर का तालिबान
गुल मोहम्मद 41 साल के हैं और तालिबान का पिछला दौर भी उन्हें अच्छी तरह से याद है।

वो कहते हैं कि "अब तो कंधार में नई इमारतें और विकास दिखाई देता हैं। जब तालिबान पहली बार आया था, तब सूखा और अकाल पड़ा हुआ था। लोग गरीबी में थे, उस समय हमारे लिए एक निवाला मिलना भी बहुत मुश्किल था। उस समय तालिबान ने अफीम की खेती की और हम बच्चों को बताया जाता था कि यह फूल है। हम इससे निकलने वाली खसखस को चीनी मिलाकर खाते थे, हमें लगता था कि यह कोई ड्राई फ्रूट है।"
गुल मोहम्मद का कहना है कि अफीम तालिबान के लिए आय का एक स्रोत था और वो कहते थे कि ये पश्चिम के ख़िलाफ़ एक हथियार है।

मैंने गुल मोहम्मद से पूछा कि क्या तालिबान अब भी नमाज़, दाढ़ी और टोपी की चेकिंग करते नज़र आते हैं, तो उन्होंने कहा कि तालिबान अभी तो कुछ नहीं कह रहे हैं और शायद इसका कारण यह है कि वे अभी ये चाहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उन्हें स्वीकार कर लें।

गुल मोहम्मद का कहना है कि वह 16 साल के थे, जब एक दिन कंधार में तालिबान के एक समूह ने उन्हें पकड़ लिया था।
"उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने दाढ़ी क्यों नहीं बढ़ाई, सिर पर टोपी क्यों नहीं है, बाल क्यों नहीं कटाये हैं। मैंने कहा कि बाल कटाने का समय नहीं मिला, तो उन्होंने कहा चलो, आपके पास समय नहीं है, हमारे पास तो है। उन्होंने मशीन ली और मेरे सिर के बीच में एक सड़क बना दी और मुझे यह कहते हुए छोड़ दिया, कि "अब तुम्हारे पास समय हो जायेगा।"

"उस समय मुझे लगा कि ये शहर नहीं बल्कि जंगल है, मैंने उस समय अपने परिवार से कहा था कि मैं अब यहां नहीं रहूंगा और फिर मैं आठ साल तक पाकिस्तान में रहा। फिर जब तालिबान चले गए और कुछ समय बीत गया, तो मैं पढ़ाई करके वापस यहां आ गया। मुझे नहीं पता कि अब मैं यहां कब तक रह पाउँगा।"
गुल मोहम्मद कहते हैं कि हमारे पास आज यहां सब कुछ है, लेकिन यह नहीं पता है कि हम इसे हमेशा इस्तेमाल कर पाएंगे या नहीं।

"अब कंधार एक आधुनिक शहर है। यहां की लड़कियां स्कूल जाने लगीं थी, महिलाएं अकेले बाहर जा सकती थीं और गाड़ी भी चलाने लगी थीं। यहां आपको पक्की इमारतें और आधुनिक शैली के आवास मिलेंगे। शहर की आधुनिक हाउसिंग सोसाइटी, ऐनो मिन्ह, हर आने वाले का ध्यान आकर्षित करती है।
गुल मोहम्मद का कहना है कि कुछ दिन पहले उनके बेटे ने कहा, कि ''बाबा, ये तालिबानी फव्वारे के गंदे पानी में हाथ मुंह क्यों धो रहे हैं?''

मैंने मुड़ कर देखा, तो शहर के बीचों-बीच बने फव्वारे के पास बैठे कुछ तालिबान आइसक्रीम खा रहे थे और जूस पी रहे थे। और कुछ अज़ान होते ही इस फव्वारे के पानी से वुज़ू करते हुए दिखाई दिए, जो महीनों से नहीं बदला गया था।"

"इसी तरह, जब मैं तीन दिन पहले स्विमिंग पूल गया, तो वह बंद था। पूछने पर बताया गया कि तालिबान आकर कहते थे, कि हम इसमें जाएंगे और वे अपने जूते लेकर उसमें जाते थे और पूल को गंदा कर रहे थे, इसलिए अब यह बंद पड़ा है।
गुल मोहम्मद का कहना है कि अतीत में तालिबान ख़ुद को इस्लामिक लिहाज़ से शिक्षित तालिबान कहते थे।

"हमें नमाज़ पढ़ने के लिए कहते थे, लेकिन अब कंधार में जब मैंने कुछ तालिबान से बात की, तो मुझे लगा कि वे ख़ुद भी बहुत से इस्लामी सिद्धांतों से परिचित नहीं हैं।"

"ऐसा लगता है कि उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो मदरसे और इस्लामी शिक्षाओं से अनजान हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो शायद तालिबान उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। मैंने एक तालिबान सदस्य से पूछा कि अगर तस्वीर हराम है तो आपके नेता तस्वीरें क्यों खिंचवा रहे हैं। वो कहने लगे कि "शायद उनकी कोई मजबूरी है।"
मैंने एक अन्य तालिबान सदस्य से कहा कि अगर पानी उपलब्ध न हो तो क्या करें। कहने लगा तयम्मुम।।। मैंने कहा कि मुझे तयम्मुम का तरीक़ा बताओ, तो उसने कहा कि मैं बाद में बताऊंगा, लेकिन फिर वह वहां से चला ही गया और वापस नहीं आया।"

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