यूँ ही नहीं कहते किरण बेदी को 'क्रेन बेदी'

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इस पुस्तक से मैंने अनुभव किया कि कैसे एक बातुल घाटी में बिना कोई बवंडर उठाए सिर्फ अपनी वाणी की मधुरता से किरण बेदी अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखती हैं और उन हजारों कैदियों के लिए आशा की किरण बन अपने किरण नाम को सार्थक करती हैं जो वर्षों से तिहाड़ जेल में थे। तभी तो एक कैदी ने उनके तिहाड़ आगमन पर लिखा था-


'आश्रम आ के हमें ऐसा लगा है लोगों

जैसे फिर से मुर्दा कलम जिंदा हुई है


हमको इंसान बनाने के लिए


देवी ने दिलो जिगर से काम किया है लोगों।'
कभी-कभी जिंदगी में ऐसा होता है कि हमारे द्वारा किए गए कार्य का श्रेय किसी और के हिस्से चला जाता है यह वास्तव में बड़ी दुःखदायी स्थिति होती है। तिहाड़ में किए गए सुधार कार्यों का श्रेय भी जब किरण बेदी को न देकर उन्हें इस तरह अपमानित किया गया कि मंच पर उनके लिए एक कुर्सी भी नहीं रखी गई तब एक सामान्य व्यक्ति की तरह किरण भी बहुत रोईं, पर जल्द ही उन्होंने स्वयं को नियंत्रित कर लिया और फैसला किया कि बेशक आम के पेड़ मैंने लगाए पर अब फल कौन खाता है उस पर मेरा अधिकार नहीं, यहीं से किरण ने अध्यात्म का सहारा लिया। पुस्तक में किरण बेदी पर लिखा भवानी प्रसाद का एक गीत कितना सार्थक है-
'एक बसंत में दो बैल चर गए थे

मेरा गुलजार का गुलजार, मगर

ऐसा तो नहीं हुआ कि मैंने

फिर कभी नहीं रोपे फूल-पौधे'

वस्तुतः किरण बेदी अँधेरे रास्तों में भटकते मौत के पास पहुँच चुके लोगों को बंजर जमीन और कब्रों से बाहर लाकर लहलहाती खिलती फसलों के बीच ला खड़ा कर देती हैं। यह पुस्तक हमें किरण बेदी का एक और रूप दिग्दर्शित कराती है जो एक औरत का है। एक पुलिस अधिकारी, समाजसेवी से भी ऊपर है किरण का यह रूप। साथ ही इस पुस्तक के जरिए किरण बेदी कहती हैं कि हमें अपने मतदान के अधिकार का सर्वोत्तम प्रयोग करना चाहिए।



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