माँ बनना मजबूरी या स्वत: इच्छा

जिम्मेदारियाँ थोपी नहीं जातीं

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'मातृत्व' एक ऐसा शब्द है, जिसे महिलाओं का परिचायक मानते हुए यह कहा गया है कि किसी महिला का ही उसके बच्चे से होता है।

यहाँ तक कि भारतीय में धारण न कर पाने के अभाव में महिलाओं को बांझ, अपशगुनी आदि शब्दों से संबोधित कर उसका भी किया जाता है। पितृसत्तात्मक इस समाज में अगर किसी महिला की पहचान है तो केवल उसकी मातृत्व क्षमता के कारण।

इस प्रकृति ने हर व्यक्ति को कोई न कोई गुण अवश्य दिया है। केवल आवश्यकता है तो बस अपने उस गुण या खूबी को पहचानने की। क्या कोई पुरुष बच्चे का पालन-पोषण नहीं कर सकता... यदि हाँ, तो फिर इसकी जिम्मेदारी अकेली ही क्यों ढोती है? आखिर क्यों औरत की ख्वाहिशों को मातृत्व का चोला पहनाकर उसे ममता के खूँटे से बाँधकर बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ रखा जाता है?

  हालाँ‍कि कुदरत ने महिलाओं को माँ बनने की एक नायाब क्षमता दी है परंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उस पर 'मातृत्व' थोपा जाए जैसा कि अधिकांश महिलाओं के साथ होता है। शादी होते ही माँ बनने के लिए उस पर धीरे-धीरे व समाज का दबाव बनाया जाता है।      
आज कई ऐसे सवाल हैं, जो घर की चहारदीवारी में कैद हर उस औरत के जेहन में उठते हैं, जिसकी आजादी व स्वनिर्णय क्षमता पर मातृत्व का चोला पहनाकर उसे बाहर की दुनिया से मरहूम कर दिया गया है।

अब उसका काम नौकरी या उन्मुक्त जिंदगी जीना नहीं बल्कि अपने बच्चे की परवरिश में अपनी उम्र के वे अनमोल पल गुजार देना है, जब उसके सपने सच होने की कगार पर हों।

हम यह स्वीकार करते हैं कि आज की सक्रियता ने महिलाओं को काफी हद तक उनकी पहचान व अधिकार दिलाए हैं परंतु आज भी हमारे देश की वे 40 प्रतिशत महिलाएँ अपने इन अधिकारों से मरहूम हैं, जिसके कारण आज उनकी हँसती-खेलती जिंदगी पर ग्रहण-सा लग गया है।

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हालाँ‍कि कुदरत ने महिलाओं को माँ बनने की एक नायाब क्षमता दी है परंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उस पर 'मातृत्व' थोपा जाए जैसा कि अधिकांश महिलाओं के साथ होता है। शादी होते ही माँ बनने के लिए उस पर धीरे-धीरे परिवार व समाज का दबाव बनाया जाता है।

यह दबाव उसे शारीरिक रूप से माँ तो बना देता है परंतु मानसिक रूप से वह इतनी जल्दी इन जिम्मेदारियों के लिए तैयार नहीं हो पाती है। यही कारण है कि कभी-कभी उसका मातृत्व उसके भीतर छुपी प्रतिभा को मार देता है और उसका मन भीतर से उसे कचोटने लगता है।

अपने परिवार को उत्तराधिकारी देने की कवायद में उसके करियर को लेकर देखे गए उसके सारे सपने कुछ वर्षों के लिए ममता की धुँध में खो जाते हैं। यह अनचाहा मातृत्व उसकी शोखी, चंचलता सभी को गुम कर उसे एक आजाद लड़की से एक गंभीर महिला बना देता है।

  अपने परिवार को उत्तराधिकारी देने की कवायद में उसके करियर को लेकर देखे गए उसके सारे सपने कुछ वर्षों के लिए ममता की धुँध में खो जाते हैं। यह अनचाहा मातृत्व उसकी शोखी, चंचलता सभी को गुम कर उसे एक आजाद लड़की से एक गंभीर महिला बना देता है।      
ऐसे वक्त में यदि उसका जीवनसाथी उसे हर निर्णय की आजादी दे व उसका साथ निभाए तो शायद वह माँ बनने के अपने निर्णय को स्वतंत्रततापूर्वक ले पाएगी।

दबाव में लिया गया कोई भी निर्णय इंसान पर जिम्मेदारियाँ तो लाद देता है परंतु उसे वह बेमन से वहन करता है। जब हम सभी एक ‍शिक्षित व सभ्य समाज का हिस्सा हैं तो क्यों न हम हर निर्णय को समझदारी से लें तथा ‍जिम्मेदारियों के मामले में स्त्री-पुरुष का भेद मिटाकर मिलकर सभी कार्य करें।

गायत्री शर्मा|
अब वह वक्त नहीं रहा, जब हर मामले में लड़कों को ही तवज्जो दिया जाता था। अब लड़कियाँ भी को अपना नाम दे सकती हैं। वे भी अपने परिवार का नाम रोशन कर सकती हैं बशर्ते उन पर अनावश्यक दबाव न बनाया जाए। तभी एक औरत सही मायने में माँ बन सकती है जब वह उसके लिए शारीरिक व मानसिक रूप से पूरी तरह से तैयार हो।



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