सिंहासन बत्तीसी : सोलहवीं पुतली सत्यवती की कहानी

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विक्रमादित्य ने सशरीर पाताल लोक जाकर उनसे भेंट करने की ठान ली। उन्होंने दोनों बेतालों का स्मरण किया। जब वे उपस्थित हुए, तो उन्होंने उनसे पाताल लोक ले चलने को कहा।

बेताल उन्हें जब पाताल लोक लाए, तो उन्होंने पाताल लोक के बारे में दी गई सारी जानकारी सही पाई। सारा लोक साफ-सुथरा तथा सुनियोजित था। हीरे-जवाहरात से पूरा लोक जगमगा रहा था। जब शेषनाग को खबर मिली कि मृत्युलोक से कोई सशरीर आया है तो वे उनसे मिले।

राजा विक्रमादित्य ने पूरे आदर तथा नम्रता से उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया तथा अपना परिचय दिया। उनके व्यवहार से शेषनाग इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने चलते वक्‍त उन्हें चार चमत्कारी रत्न उपहार में दिए। पहले रत्न से मुंहमांगा धन प्राप्त किया जा सकता था।
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