सिंहासन बत्तीसी : बाइसवीं पुतली अनुरोधवती की कहानी

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वह युवक सचमुच ही बड़ा ज्ञानी और कला मर्मज्ञ था। उसने समय-समय पर अपनी योग्यता का परिचय देकर राजा का दिल जीत लिया। एक दिन दरबार में एक अत्यंत रूपवती नर्तकी आई। उसके नृत्य का आयोजन हुआ और कुछ ही क्षणों में महफिल सज गई।


वह युवक भी दरबारियों के बीच बैठा हुआ नृत्य और संगीत का आनन्द उठाने लगा। वह नर्तकी बहुत ही सधा हुआ नृत्य प्रस्तुत कर रही थी और दर्शक मुग्ध होकर रसास्वादन कर रहे थे। तभी न जाने कहां से एक भंवरा आकर उसके वक्ष पर बैठ गया।

नर्तकी नृत्य नहीं रोक सकती थी और न ही अपने हाथों से भंवरे को हटा सकती थी, क्योंकि भंगिमाएं गड़बड़ हो जातीं। उसने बड़ी चतुरता से सांस अन्दर की ओर खींची तथा पूरे वेग से भंवरे पर छोड़ दी। अनायास निकले सांस के झौंके से भंवरा डरकर उड़ गया। क्षणभर की इस घटना को कोई भी न ताड़ सका, मगर उस युवक की आंखों ने सब कुछ देख लिया।
वह 'वाह! वाह!' करते उठा और अपने गले की मोतियों की माला उस नर्तकी के गले में डाल दी। सारे दरबारी स्तब्ध रह गए। अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा हो गई।




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