सिंहासन बत्तीसी : बाइसवीं पुतली अनुरोधवती की कहानी

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इतनी ठोकरें खाने के बाद भी उसकी प्रकृति तथा व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आ सका।

वह द्वार पर खड़ा था, तभी उसके कान में वादन का स्वर पड़ा और वह बड़बड़ाया- 'महफिल में बैठे हुए लोग मूर्ख हैं। संगीत का आनन्द उठा रहे हैं, मगर संगीत का जरा भी ज्ञान नहीं है। साज़िन्दा गलत राग बजाए जा रहा है, लेकिन कोई भी उसे मना नहीं कर रहा है।'

उसकी बड़बड़ाहट द्वारपाल को स्पष्ट सुनाई पड़ी। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उसने उसको सम्भालकर टिप्पणी करने को कहा।
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