सिंहासन बत्तीसी : सत्रहवीं पुतली विद्यावती की कहानी

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ऐसे ही एक रात जब वे वेश बदलकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहे थे तो उन्हें एक झोपड़े से एक बातचीत का अंश सुनाई पड़ा। कोई औरत अपने पति को राजा से साफ-साफ कुछ बताने को कह रही थी और उसका पति उसे कह रहा था कि अपने स्वार्थ के लिए अपने महान राजा के प्राण वह संकट में नहीं डाल सकता है।

विक्रम समझ गए कि उनकी समस्या से उनका कुछ सम्बन्ध है। उनसे रहा नहीं गया। अपनी प्रजा की हर समस्या को हल करना वे अपना कर्तव्य समझते थे। उन्होंने द्वार खटखटाया, तो एक ब्राह्मण दम्पति ने दरवाजा खोला।

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