सिंहासन बत्तीसी : छब्बीसवीं पुतली मृगनयनी की कहानी

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विक्रम ने उसकी बातों की सत्यता की जांच करने के लिए तुरन्त उसके बताए पते पर अपने सिपाहियों को भेजा। सिपाहियों ने आकर खबर दी कि उस स्‍त्री को अपने नौकर के गिरफ्तार होने की सूचना मिल चुकी है। अब वह विलाप करके कह रही है कि लुटेरों ने सारा धन लूट लिया और उसके पति की हत्या करके भाग गए।

उसने पति की चिता सजवाई है और खुद को पतिव्रता साबित करने के लिए सती होने की योजना बना रही है।

सुबह युवक को साथ लेकर सिपाहियों के साथ विक्रम उस स्‍त्री के घर पहुंचे तो दृश्य देखकर सचमुच चौंक गए।

स्‍त्री अपने पति की चिता पर बैठ चुकी थी और चिता को अग्नि लगने वाली थी। राजा ने चिता को अग्नि देने वाले को रोक दिया तथा उस स्‍त्री से चिता से उतरने को कहा।

उन्होंने सारा धन उसे दिखाया तथा नौकर को आगे लाकर बोले कि सारी सच्चाई का पता उन्हें चल गया है। उन्होंने उस स्‍त्री को त्रिया चरित्र का त्याग करने को कहा तथा राजदण्ड भुगतने को तैयार हो जाने की आज्ञा दी।
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