बगलामुखी सिद्धपीठ

बड़ी खेरमाई का प्राचीन इतिहास

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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती महाराज की प्रेरणा से तैयार कराया। यह कार्य शंकराचार्य के शिष्य ब्रह्मचारी सुबुद्धानंद ने संपन्न कराते हुए 18 जुलाई 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से भूमि पूजन कराया था।


के सिविक सेंटर में बने मंदिर में 7 फरवरी 2000 में काशी के विद्वानों द्वारा कराया गया। तत्पश्चात शंकराचार्यजी द्वारा पीतांबरा भगवती पराम्बा बगला की प्रतिष्ठा कराई गई। इस सिद्धपीठ में नवरात्रि के दौरान मनोकामना कलश स्थापना के साथ ही भगवती का नौ दिनों तक विशेष श्रृंगार ब्रह्मचारी चैतन्यानंद महाराज द्वारा कराया जाता है।

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बड़ी खेरमाई का प्राचीन इतिहास : भानतलैया स्थित मां बड़ी खेरमाई मंदिर का प्राचीन इतिहास है। मंदिर में पहले प्राचीन प्रतिमा शिला के रूप में थी जो वर्तमान प्रतिमा के नीचे के भाग में आज भी स्थापित है। जहां प्रतिदिन पूजन किया जाता है। मंदिर में प्रतिमा कल्चुरिकालीन है और यहां लगभग 800 वर्षों से शहर के अलावा अन्य शहरों के लोग पूजन करते हैं।

ऐसा बताया जाता है कि एक बार गोंड राजा मदनशाह मुगल सेनाओं से परास्त होकर यहां खेरमाई मां की शिला के पास बैठ गए। तब पूजा के बाद उनमें नया शक्ति संचार हुआ और राजा ने मुगल सेना पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया। तभी से लोग इस शिला का पूजन कर रहे हैं। लगभग 500 वर्ष पहले गोंड राजा संग्रामशाह ने मढि़या की स्थापना उक्त स्थल पर कराई थी।
पूजन की परंपरा : नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में मुख्य पूजा वैदिक रूप से होती है। आदिवासी पण्डों द्वारा अभी भी लोक परंपरा से माता का पूजन किया जाता है। नवरात्रि और अन्य अवसरों पर महाकौशल के आदिवासी अंचलों से बड़ी संख्या में आदिवासी पूजन करने यहां आते हैं। वे मां खेरमाई को अपनी आराध्य देवी मानते हैं।

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खेरमाई नाम कैसे पड़ा : कहा जाता है कि पहले के समय में गांव-खेड़ा की भाषा ज्यादा प्रचलित थी। तब पूरा क्षेत्र गांव के जैसे था। खेड़ा से इसका नाम धीरे-धीरे खेरमाई प्रचलित हो गया। शहर अब महानगर के रूप में पहुंच गया है लेकिन आज भी मंदिर में मां खेरमाई का ग्रामदेवी के रूप में पूजन किया जाता है। किसी भी कार्य के पहले माता के दरबार में हाजिरी देने की प्रथा आज भी कायम है। मंदिर में भगवान शिव, काल भैरव, मां नर्मदा, हरदौल बाबा की भी प्रतिमा स्थापित है।
राजा कोकल्यदेव ने बनवाया मंदिर : चारखंबा स्थित कल्चुरिकालीन है। इसे राजा कोकल्यदेव ने बनवाया था। जो कई वर्षों तक अव्यवस्था के कारण जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच गया था। 1980 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। तब से लेकर लगातार इस मंदिर में आस्थावानों का पहुंचना जारी है। नवरात्रि के दौरान उपासना के लिए मंदिर में सैकड़ों की संख्या में भक्त परिवार सहित पहुंचते हैं।
ऐसी मान्यता है कि यहां पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है। यह स्थान सदियों से सनातन धर्मावलंबियों के आस्था का केन्द्र है। वर्तमान में इस मंदिर की व्यवस्था जिला प्रशासन के हाथ में है।

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गौतम जी की मढि़या : कछपुरा ब्रिज के ठीक सामने स्थित गौतम जी की मढि़या अति प्राचीन देवी मंदिर है। यहां विशाल वृक्ष के नीचे महाशक्ति का चमत्कारी देवी विग्रह विराजमान है। नवरात्रि के दौरान इस माता को जल ढारने भक्तों की भीड़ उमड़ती है। गौतम परिवार परंपरागत रूप से यहां विधि-विधान से पूजन-अर्चन करता आ रहा है। इसी वजह से इसका नाम गौतम जी की मढि़या प्रचलित हो गया।
पंडा की मढि़या : गंगानगर चौक के आगे पंडा की मढि़या काफी प्राचीन देवी-पीठ है। यहां मातारानी के विग्रह दर्शनीय हैं। उनके साथ ही अन्य देवताओं के भी विग्रह प्रतिष्ठित हैं। मंदिर की बनावट प्राच्य स्थापत्य शैली की है। इसके ठीक सामने गोंडवाना काल का तालाब है। पहले यह साफ-सुथरा था जिससे जल लेकर देवी को अर्पित किया जाता था, लेकिन अब इसका अस्तित्व संकट में है। मंदिर में नौ दिनों तक विशेष अनुष्ठान भी होता है।



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