परमाणु करार पर माकपा का रुख नरम

हैदराबाद (भाषा)| भाषा|
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भारत-अमेरिका परमाणु करार के खिलाफ आग उगलने वाले वामदलों के एक धड़े माकपा ने नरमी दिखाते हुए शनिवार को संकेत दिए कि अमेरिका के साथ हुए असैन्य परमाणु समझौते का एक सीमा से परे विरोध नहीं किया जाएगा।


माकपा ने कहा हर चीज को सरकार गिराने से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या माकपा परमाणु करार के मुद्दे पर संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेने पर विचार करेगी, पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा हर चीज को सरकार गिराने की बात से क्यों जोड़ दिया जाता है। इससे कोई मकसद पूरा नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि माकपा सिर्फ राष्ट्रीय हितों को लेकर चिंतित है और हमारी माँग है कि समझौते को कार्यान्वित नहीं किया जाना चाहिए।

परमाणु करार पर मतभेदों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की इस्तीफे की पेशकश के सवाल पर माकपा नेता ने कहा कि हम यहाँ हस्तियों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। हमारी चिंता को किसी के लिए खतरा नहीं समझा जाना चाहिए। यह नीति से संबंधित है। सरकारें आएँगी और जाएँगी, लेकिन समझौते बरकरार रहेंगे। येचुरी ने कहा कि उनकी पार्टी को अपने विचार व्यक्त करने का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसे किसी के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए।

येचुरी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने समझौता 123 पर सिर्फ अपने विचार दिए हैं, जो हमारे विचारों से मेल नहीं खाते। उन्होंने कहा हमारी मूल माँग यह है कि परमाणु करार कार्यान्वित न हो। इस पर संसद में चर्चा कराई जानी चाहिए। यह पीठासीन अधिकारी पर छोड़ दिया जाए कि वह चर्चा पर मतदान कराते हैं या नहीं।

माकपा ने कहा कि पार्टी को 123 समझौते को लेकर गंभीर चिंता है, क्योंकि यदि एक बार यह कार्यान्वित हो गया तो भारत अमेरिकी रक्षा प्रणाली का सामरिक भागीदार बन जाएगा, जो देश के लिए बाध्यकारी होगा।
यह पूछे जाने पर कि क्या अब समझौते में संशोधन की कोई गुंजाइश है, माकपा नेता ने कहा कि इसके कार्यान्वयन से पहले भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) तथा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) के साथ दो समझौतों पर हस्ताक्षर करने हैं, जहाँ सुधार किए जा सकते हैं।

उन्होंने साथ ही बताया कि वामदल बंगाल की खाड़ी में चार से नौ सितंबर तक होने जा रहे अमेरिका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, जापान तथा भारत के संयुक्त युद्धाभ्यास का विरोध करेंगे।



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