कोटमसर की गुफाएँ दिखेंगी राजपथ पर

रायपुर| भाषा|
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग स्थित विश्व प्रसिद्ध कोटमसर की गुफा की झाँकी का चयन के लिए किया गया है।


आधिकारिक सूत्रों ने आज यहाँ बताया कि दुनिया भर में अपने विलक्षण प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित कोटमसर की रहस्यमयी गुफाएँ नई दिल्ली के राजपथ पर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय परेड में लाखों दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र बनेंगी।

अधिकारियों ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार के जनसम्पर्क संचालनालय द्वारा तैयार की जाने वाली इस झाँकी में कोटमसर की गुफाओं के नैसर्गिक सौन्दर्य को प्रदर्शित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने नई दिल्ली में आयोजित सात चरणों की अपनी उच्च स्तरीय बैठकों में इस झाँकी के त्रिआयामी मॉडल के अवलोकन तथा उस पर गहन विचार-विमर्श और मूल्याकंन के बाद अंतिम रूप से इसका चयन कर लिया है।


अधिकारियों ने बताया कि गणतंत्र दिवस के राष्ट्रीय परेड में प्रदर्शन के लिए निकाली जाने वाली झाँकियों के चयन के लिए रक्षा मंत्रालय की उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति में देश के अनेक प्रसिद्ध वास्तुशिल्पी, कला, संस्कृति, संगीत और अन्य विधाओं के विशेषज्ञ शामिल थे।
देश के 28 राज्यों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद जिन 13 राज्यों की झाँकियों का चयन किया गया है, उनमें छत्तीसगढ़ शामिल है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान स्थित कोटमसर की प्राकृतिक गुफाएँ पिछले कई वर्षो से अपने प्रागैतिहासिक अवशेषों, अदभुत प्राकृतिक संरचनाओं और विस्मयकारी सौन्दर्य के लिए देश-विदेश के सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं।
इन गुफाओं की खोज 1951 में प्रसिद्ध भूगोलविद् डॉ. शंकर तिवारी ने की थी। फिजीकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद, बीरबल साहनी इंस्टीटयूट ऑफ पेल्कोबाटनी लखनऊ और भू-गर्भ अध्ययनशाला लखनऊ के वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधानों में कार्बन डेटिंग प्रणाली से यह भी पता लगाया है कि कोटमसर की गुफाओं में प्रागैतिहासिक युग के इंसान भी रहा करते थे।
भू-गर्भ शास्त्रियों के अनुसार करोड़ों वर्ष पहले यह समूचा इलाका पानी में डूबा हुआ था। कोटमसर की गुफाओं के बाहरी और आंतरिक हिस्से के वैज्ञानिक अध्ययन से इसकी पुष्टि होती है। इन गुफाओं का निर्माण भी प्राकृतिक परिवर्तनों के साथ पानी के बहाव के कारण ही हुआ है।

चूना पत्थर से बनी इन गुफाओं की बाहरी और आंतरिक सतह के अध्ययन से पता चलता है कि प्राकृतिक रूप से इनका निर्माण करोड़ों वर्ष पहले हुआ था।
कोटमसर की गुफाएँ जमीन से लगभग 55 फुट नीचे स्थित हैं। मुख्य गुफा की लंबाई 330 मीटर है और इसमें कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर चौड़े हैं। इन गुफाओं में हमेशा गहरा अंधेरा रहता है। इनमें पाई जाने वाली मछलियों की आँखे नहीं होने के कारण उन्हें अंधी मछलियों के नाम से जाना जाता है। कोटमसर गुफाओं की अंधी मछलियों पर भी वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं।
कोटमसर में चूना पत्थर के रिसाव, कार्बन डाई आक्साइड और पानी की रासायनिक क्रिया से गुफाओं की सतह से लेकर छत और दीवारों पर अभूतपूर्व प्राकृतिक संरचनाएं बन गई है। इन संरचनाओं में उपस्थित जिप्सम और क्वार्टजाइट के कणों के कारण इस पर प्रकाश पड़ने पर यह श्वेत संरचनाएँ अद्भुत नयनाभिराम दृश्य उत्पत्र करती हैं।

भू-गर्भ शास्त्रियों के मुताबिक छत से झाड़ फानुस और झूमर की तरह लटकी इन संरचनाओं को बनाने में प्रकृति ने करोड़ों वर्षो का समय लिया है। छत से लटकी इन संरचनाओं को स्टेलेक्टाइट और सतह से छत की ओर उठी संरचनाओं को स्टेलेमाइट कहते हैं।
अधिकारियों ने बताया कि कोटमसर गुफा की झाँकी का चयन राष्ट्रीय परेड के लिए किए जाने पर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राज्य की जनता को बधाई दी है। (भाषा)



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