बर्ट्रेंड रसेल

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इसके विपरीत मेरी दादी, जो दादाजी से 23 साल छोटी थीं, मेरे संपूर्ण बाल्यकाल में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थीं। वेस्कॉच पुरोहितवादी थीं तथा धर्म और राजनीति के मामलों में उदार थीं (सत्तर वर्ष की उम्र में वे एक व्यक्तिवादी बन गई थीं), मगर नैतिकता के सभी मुद्दों पर बेहद कठोर थीं। दादाजी से विवाह के समय वे बेहद छोटी तथा शर्मीली थीं। मेरे दादाजी विधुर थे तथा उनकी दो संतानें व चार सौतेले बच्चे थे। शादी के कुछ वर्षों बाद वे देश के प्रधानमंत्री बन गए थे। दादी के लिए यह कठिन अग्नि परीक्षा रही होगी। उन्होंने बताया था कि एक बार जब वे लड़कपन में कभी रोजर्स द्वारा किए जाने वाले प्रसिद्ध ब्रेकफास्ट में गई थीं तो उनका शर्मीलापन देख रोजर्स ने कहा था- 'अपनी जुबान थोड़ी खोला करो, तुम्हें इसकी जरूरत है, माय डियर! 'दादी की बातों से जाहिर था कि उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि प्यार में डूबना क्या होता है।

उन्होंने एक बार मुझे बताया था कि जब उनके हनीमून पर उनकी मां भी उनके पास पहुंच गईं तो उन्होंने कैसे राहत की सां ली थी। एक अन्य अवसर पर उन्होंने दुःख व्यक्त किया था कि प्यार जैसे तुच्छ विषय पर इतनी अधिक कविताएं क्यों लिखी जाती हैं, लेकिन मेरे दादाजी के लिए वे एक समर्पित पत्नी थीं और मेरी जानकारी में वे अपने कर्तव्यों को पूरा करने में कभी असफल नहीं हुईं।
एक मां और दादी के रूप में बेहद, परंतु हमेशा बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से नहीं, विनयपूर्ण थीं। मेरे ख्याल में वे कभी उद्दा भावनाओं और प्रचुर जीवनशक्ति को नहीं समझ सकीं। वे चाहती थीं कि हर चीज विक्टोरियन मनोभावों के कोहरे में देखी जाए। मुझे याद है, मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता था कि एक ही समय पर दो विरोधाभासी विचार रखना गलत है। जैसे यह सोचना कि सभी लोग अच्छे घरों में रहें, मगर साथ ही नए घर भी न बनें, क्योंकि वे आंखों को खटकते हैं।

दादी के लिए हर मनोभाव का पृथक और विशिष्ट अधिकार होता था और उनका ख्याल था कि सिर्फ तर्क जैसी ठंडी वज की बिना पर एक मनोभाव को दूसरे मनोभाव पर थोपा नहीं जा सकता। उनका लालन-पालन उस जमाने के आदर्शों के अनुरूप हुआ था, वे उच्चारण में गलती किए बिना धाराप्रवाह फ्रेंच, जर्मन और इटालियन भाषाएं बोल सकती थीं। वे शेक्सपीयर, मिल्टन तथा 18वीं सदी के कवियों को निकट से जानती थीं। वे राशि चिन्हों और नौ काव्यदेवियों (यूनानी पुराण में वर्णित) के नाम दोहरा सकती थीं।

उन्हें व्हिग परंपरा के अनुसार अंगरेजी इतिहास का सूक्ष्म ज्ञान था। फ्रेंच, जर्मन और इटालियन साहित्य से वे परिचित थीं। सन 1830 के बाद की राजनीति का उन्हें व्यक्तिगत ज्ञान था, लेकिन तर्क से संबंधित कोई भी बात उनकी मानसिक जिंदगी से अनुपस्थित थी। वे कभी नहीं समझ पाईं कि नदी पर जलबंधक कैसे काम करते हैं, हालांकि मैंने कई लोगों को उन्हें यह समझाने की कोशिश करते हुए सुना था। उनकी नैतिकता विक्टोरियन कट्टरता के स्तर की थी। उन्हें कोई भी यह विश्वास नहीं दिला सकता था कि बात-बात पर कसम खाने वाले व्यक्ति में भी कुछ अच्छे गुण हो सकते हैं। हालांकि कुछ अपवाद थे। वे हॉरेस वालपोल की मित्र बेरी कुमारियों को जानती थीं और एक बार उन्होंने मुझसे निंदारहित स्वर में कहा था कि 'बेरी बहनें पुराने फैशन की थीं और वे कभी-कभी कसमें खाती थीं।'
अपने जैसे अन्य लोगों की तरह वे बायरन के प्रति नरम कोना रखती थीं और उन्हें युवावस्था के नाशुक्रे प्यार का अभागा शिकार मानती थीं, लेकिन यह सहिष्णुता वे शेली के प्रति नहीं दिखाती थीं। उन्हें शेली का जीवन घृणित और उसकी कविता नीरस लगती थी। मेरे ख्याल से कीट्स का तो उन्होंने नाम भी नहीं सुना था। वे गोथे से लेकर शिकार तक के प्राचीन महाद्वीपीय साहित्य से परिचित थीं, लेकिन योरप के तत्कालीन लेखकों के बारे में कुछ नहीं जानती थीं। तुर्गनेव ने एक बार उन्हें अपना उपन्यास दिया था, मगर उन्होंने उसे कभी नहीं पढ़ा। वे तुर्गनेव को अपने किसी मित्र के कजिन से ज्यादा कुछ नहीं समझती थीं। वे जानती थीं कि तुर्गनेव किताबें लिखते हैं, पर यह काम तो लगभग सभी करते थे।
आधुनिक अर्थ में लें तो मनोभावनाओं के उनमें कोई खास चिन्ह नहीं थे, लेकिन कुछ भावनाएं उनमें मौजूद थीं- देश के लिए प्यार, जनचेतना, अपने बच्चों से प्यार उनके लिए प्रशंसनीय भावनाएं थीं। पैसों से प्यार, शक्ति से प्यार तथा अहंकार उनके हिसाब से बुरी भावनाएं थीं। उनका मानना था कि अच्छे व्यक्ति हमेशा अच्छी प्रेरणा से काम करते हैं, लेकिन बुरे व्यक्तियों, यहां तक कि निकृष्टतम व्यक्तियों के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं, जब वे पूरी तरह बुरे नहीं होते। विवाह की संस्था उनके लिए एक कठिन पहेली थी।
उनके अनुसार एक-दूसरे को प्रेम करना पति-पत्नी का कर्तव्य होता है, लेकिन यह ऐसा कर्तव्य है जो उन्हें बेहद आसानी से नहीं निभाना चाहिए, क्योंकि यदि वे शारीरिक आकर्षण की वजह से एक-दूसरे के करीब आते हैं तो उनके रिश्ते में कोई चीज ठीक नहीं है, लेकिन यह बात वे इस ढंग से नहीं कहती थीं-'तुम जानते हो, मैं कभी नहीं सोचती कि पति-पत्नी का प्यार माता-पिता और संतान के प्यार की तरह पवित्र होता है क्योंकि पति-पत्नी के रिश्ते में कभी-कभी थोड़ा स्वार्थ आ जाता है।'
सेक्स जैसे विषय पर वे अपने विचार इससे बेहतर ढंग से व्यक्त नहीं कर सकती थीं। शायद एक बार मैंने उन्हें इस वर्जित विषय को छूने की कोशिश करते सुना था। यह तब हुआ जब उन्होंने कहा था कि लॉर्ड पामरसन पुरुषों में विचित्र हैं, क्योंकि वे एक अच्छे आदमी नहीं हैं। वे शराब को नापसंद करती थीं, तंबाकू से उन्हें घृणा थी और वे हमेशा शाकाहारी बनने की कगार पर रहती थीं।
उनका जीवन कष्टसाध्य था। वे केवल सादा भोजन ही खाती थीं और सुबह आठ बजे नाश्ता करती थीं और अस्सी साल की उम्र तक चाय के बाद वे कभी भी आरामदायक कुर्सी पर नहीं बैठीं। वे पूर्णतः गैर दुनियावी थीं और दुनियावी सम्मानों के बारे में सोचने वालों से घृणा करती थीं। मुझे खेद के साथ कहना पड़ता था कि महारानी विक्टोरिया के प्रति उनके विचार कहीं भी सम्मानजनक नहीं थे। वे बड़े मजे लेकर बताती थीं कि एक बार जब वे विंडसर (शाही महल) में थी तो कुछ अस्वस्थ महसूस कर रही थी। तब महारानी ने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा था- 'लेडी रसेल बैठ सकती हैं। लेडी फलां-फलां उनके आगे खड़ी हो जाएंगी।'
जब मैं चौदह बरस का हुआ तो दादी की बौद्धिक कूपमंडूकता मेरे लिए दुसाध्य हो गई और उनकी कट्टर नैतिकता मुझे अति लगने लगी और उनका अति शुद्धतावाद भी मुझे अतिशयोक्ति लगने लगा, लेकिन बचपन में उन्होंने मुझे अत्यधिक प्यार दिया और मेरे कल्याण की उन्हें बेहद परवाह थी, अतः मैं उनसे स्नेह करता था। उनके प्यार ने मुझे सुरक्षा की वह भावना दी, जिसकी जरूरत हर बच्चे को होती है। मुझे याद है कि चार-पांच बरस की उम्र में एक बार मैं बिस्तर पर पड़ा सोच रहा था कि दादी मर जाएगी तो कितनी भयंकर बात होगी और जब मेरी शादी के बाद वे वाकई मर गईं तो मुझे बिलकुल भी दुःख नहीं हुआ, लेकिन उम्र गुजरने पर अतीत का चिंतन करते हुए मैंने महसूस किया कि जीवन के प्रति मेरा रवैया, निर्धारित करने में दादी की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उनकी निडरता, जनचेतना, रिवाजों की अवहेलना तथा बहुमत के प्रति उदासीनता ने मुझे नकल की हद तक प्रभावित किया। उन्होंने मुझे बाइबिल की एक प्रति दी थी, जिसके फ्लाय लीफ (पुस्तक के प्रारंभ या अंत का सादा पन्ना) पर उनके प्रिय उद्धरण अंकित थे। इनमें से एक उद्धरण था- 'बुरा काम करने के लिए बहुमत के पीछे नहीं चलना चाहिए।' इस उद्धरण पर वे बहुत जोर देती थीं और इसी वजह से अपनी जिंदगी के बाद के वर्षों में मैं छोटे अल्पसंख्यक समूहों का साथ देने में कभी नहीं डरा।
आत्मकथा (बर्ट्रेंड रसेल)



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