बर्ट्रेंड रसेल

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सर डेवी ने शैली के पूर्वोदाहरण के आधार पर उन्हें आश्वासन दिया कि उनके विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चलेगा। अतः मुझे और मेरे भाई को चान्सरी में संरक्षण में रखा गया। कॉबडेन सैंडरसन ने मुझे मेरे दादा-दादी को सौंप दिया। उनके घर पेसब्रोक लॉज में आने का जिक्र तो मैं पहले ही कर चुका हूं। कोई शक नहीं कि मेरे इसी इतिहास की वजह से नौकर मुझमें इतनी दिलचस्पी ले रहे थे।


मेरी मां की तो मुझे कोई स्मृति नहीं है। हां, इतना याद है कि एक बार जब मैं टट्टू गाड़ी से गिर पड़ा था, तब वे मेरे पास थीं। मुझे मालूम है कि मेरी यह स्मृति सच्ची है, क्योंकि कई वर्षों तक अपने मन में ही रखने के बाद मैंने इसकी पुष्टि कर ली थी। पिता के बारे में मुझे दो बातें याद हैं- उन्होंने मुझे एक लाल कागज दिया था, जिसके रंग ने मुझे प्रसन्न कर दिया था और मुझे याद है कि एक बार मैंने उन्हें बाथटब में नहाते देखा था। मेरे माता-पिता अपनी इच्छानुसार, रॅवनस्क्रॉफ्ट के बाग में दफनाए गए थे, किंतु बाद में उनकी कब्रों को चेनीज स्थित पारिवारिक कब्रगाह में स्थानांतरित कर दिया गया।
रिचमंड पार्क स्थित मेरे दादा-दादी का निवास 'पेमब्रोक लॉज' सिर्फ दो मंजिलों वाला चौड़ा मकान है। यह राजकीय भेंट के रूप में उन्हें प्राप्त हुआ था। इसका नाम लेडी पेमब्रोक के नम पर पड़ा है, जिनके प्रति जॉर्ज तृतीय अपनी मानसिक रुग्णावस्था के दिनों में समर्पित थे। महारानी ने चालीस के दशक में इसे मेरे दादा-दादी को जीवन भर के लिए दिया था और वे तभी से इसमें रह रहे हैं। किंग्लेक की रचना 'इनवेजन ऑव द क्रीमिया' में वर्णित प्रसिद्ध मंत्रिमंडल बैठक, जिसमें क्रीमियन युद्ध का निर्णय लेते हुए कई कैबिनेट मंत्री सो गए थे, पेमब्रोक हॉल में हुई थी। बाद में किंग्लेक रिचमंड में रहने लगे थे और मैं उन्हें अच्छी तरह जानता था। एक बार मैंने सर स्पेंसर वालपोल से पूछा था कि किंग्लेक नेपोलियन तृतीय के प्रति इतनी कटु भावना क्यों रखते हैं। सर स्पेंसर ने जवाब दिया कि उनमें एक औरत को लेकर झगड़ा हो गया था। जाहिर है, मैंने पूछा- 'क्या आप मुझे यह कहानी सुनाएंगे।' उन्होंने कहा, 'नहीं श्रीमान, मैं तुम्हें यह कहानी नहीं सुनाऊंगा।' और थोड़े ही दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई।

पेमब्रोक लॉज में 11 एकड़ का बगीचा था, जिसकी अधिकतर देखभाल नहीं की जाती थी। अठारह साल की उम्र तक इस बगीचे ने मेरे जीवन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बगीचे के पश्चिमी हिस्से में एक विशाल परिदृश्य नजर आता था, जो एप्सॉम डाउन (जिसे मैं अप्स एंड डाउन समझता था) से होकर विंडसर कॉसल तक फैला था। इनके बीच में हिंडहेड तथा लीथ हिल स्थित थे। मैं लंबे-चौड़े क्षितिज और बेरोकटोक सूर्यास्त दर्शन का अभ्यस्त हो गया था और तभी से मैं इन दिनों के बिना खुशी से नहीं रह पाया। बगीचे में कुछ बहुत खूबसूरत वृक्ष थे- बलूत, बीचफल, हॉर्स एंड स्पैनिश चेस्टनट, नीबू, क्रिप्टोमॅरिया तथा भारतीय राजाओं द्वारा भेंट किए गए सुंदर देवदार। बगीचे में ग्रीष्मगृह, झाड़ीदार बाड़े, जयपत्र के झुरमुट और कई अनगिनत गुप्त स्थल थे, जहां बड़ों से नजर बचाकर छिपा जा सकता था, इतने आराम से कि पकड़े जाने का रंच मात्र भी डर न रहे।

बॉक्स हेजेज में कई फूलदार बाग भी थे। पेमब्रोक लॉज में जब तक मैं रहा, बगीचा प्रतिवर्ष उपेक्षित होता चला गया। बड़े पेड़ गिर गए, रास्तों पर झाड़ियां उग आईं, लॉन की घास बड़ी और अव्यवस्थित हो गई तथा बॉक्स हेजेज एक तरह से पेड़ों में बदल गए। शायद बगीचा अपना शानदार अतीत याद करता था, जब विदेशी राजदूत इसके लॉन पर चहलकदमी करते थे और राजकुमार फूलों की सुव्यवस्थित झाड़ियों की प्रशंसा करते थे। बगीचा अपने अतीत में जीता था और मैं भी इसके साथ अतीत में जीता था। मैं अपने माता-पिता और बहन को लेकर कल्पनाजाल बुना करता।
मैं अपने दादाजी के प्रभावशाली दिनों की कल्पनाएं करता। वयस्कों की जो बातें मैं सुनता था, वे अधिकतर बहुत पहले घटी घटनाओं के बारे में होती थीं। कैसे मेरे दादाजी एल्बा में नेपोलियन से मिले, कैसे मेरी दादी के पिता के चाचा ने अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध में जिब्राल्टर की रक्षा की और कैसे उनके दादाजी काउंटी से अलग कर दिए गए। जब उन्होंने कहा कि एटना पहाड़ की ढलान पर जमे इतने अधिक लावे का मतलब यह है कि दुनिया 4004 ईसा पूर्व से पहले बनी है। कभी-कभी वार्तालाप हाल की घटनाओं पर भी आ जाता। तब मुझसे कहा जाता है कि कैसे कार्लाइल ने हरबर्ट स्पेंसर को 'परफेक्ट वैक्यूम' कहा था या ग्लैडस्टोन से मुलाकात होने पर डार्विन को किस तरह गर्व होता था।
मेरे माता-पिता मर चुके थे और मैं सोचा करता कि आखिर वे किस तरह के इन्सान होंगे। अकेले में मैं बगीचे में घूमा करता, कभी चिड़ियों के अंडे खोजता तो कभी समय की उड़ान पर चिंतन करता। मैं अपनी स्मृतियों के आधार पर यह कह सकता हूं कि चैतन्य मन पर बचपन के सबसे महत्वपूर्ण तथा रचनात्मक प्रभाव उन भगोड़े पलों में पड़ते हैं, जब बच्चा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है और वह कभी भी बड़ों से इन पलों का जिक्र नहीं करता। मैं सोचता हूं कि युवावस्था में भी व्यक्ति को ऐसे पल मिलना चाहिए, जब वह बाहर से थोपी दुनिया से अलग अपनी ही दुनिया में घूम सके। इससे उसकी चेतना में इन भगोड़े प्रतीत होने वाले, लेकिन अति महत्वपूर्ण प्रभावों का निर्माण हो सकेगा।
मुझे जैसा याद है, मेरे दादाजी अस्सी पार के व्यक्ति थे। या तो उन्हें बाथ चेयर पर बिठाकर बगीचे में घुमाया जाता या वे अपने कमरे में बैठकर हॉन्सार्ड को पढ़ते। उनकी मृत्यु के समय मेरी उम्र सिर्फ 6 साल थी। उस समय मेरा भाई स्कूल में पढ़ता था। मुझे याद है कि दादाजी की मौत के दिन जब वह गाड़ी में बैठकर घर आया, हालांकि उस समय स्कूल का मध्य सत्र चल रहा था तो मैं उसे देखकर चिल्लाया था, 'हुर्रा' और मेरी आया ने कहा था- 'हश'! आज तुम्हें 'हुर्रा' नहीं कहना चाहिए।' इस वाकए से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मेरे लिए दादाजी कोई खास महत्व नहीं रखते थे।



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