जीने के लिए तेरी याद बहुत थी

NDND
घर मेरा जलाने को जो आजाद बहुत थी
उस आग को खुद मेरी भी इमदाद बहुत थी

एक ताजमहल ही मेरी बस्ती में नहीं था
काटे हुए हाथों की भी तादाद बहुत थी

होती न अगर जिस्म की तहजीब कोई शै
जीने के लिए एक तेरी बहुत थी

कैदी की तरह वक्त की मुट्ठी में अना है
कम्बख्त मेरे जिस्म में आजाद बहुत थी

हम वो खराबे हैं जो मिटने से बचे हैं
सुनते हैं ये दुनिया कभी आबाद बहुत थी

भगवान तो बस चौदह बरस घर से दूर
जफर गोरखपुर
अपने लिए बनवास की मियाद बहुत थी।



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