नईम के नवगीत : जन्मदिन विशेष

श्रीकांत उपाध्याय

नईम
NDND
कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा और प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण काव्य की प्राकृतिक स्थिति होती है। सीमित, सटीक और वजनदार शब्द, लयबद्धता तथा मन मस्तिष्क को झकझोर देने वाली अलंकारिक भाषा श्रेष्ठ काव्य की अनिवार्यता होती है। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक परिस्थितियों का प्रभाव और उनके प्रति संवेदनशीलता की झलक भी काव्य में दिखाई देती है।

आज के काव्य में छंदबद्धता की अनिवार्यता नहीं है। आसानी से पढ़ी/समझी जा सकने वाली छंदमुक्त कविता ने पाठकों की सोच और समझ में स्थान बना लिया है। वर्तमान कविता का स्वरूप विस्तृत है। आत्मकेंद्रित पीड़ा और आनंदवाद से इतर जीवन संघर्षों, घटनाओं, समाज में व्याप्त दुख, दर्द, विषाद, आक्रोश, अव्यवस्था के प्रति जो गुस्सा कविताओं में दिखाई देता है, वह गद्य कविता नई कविता, नज्म क्षणिकाओं के रूप में पाठकों की आवाज को मुखर करता है। इसी श्रृंखला में अपने आसपास की नंगी सचाई का आईना है नईम के नवगीत।

कवि नईम ने नवगीत परंपरा को कविताओं की जमात में एक नया आयाम देने की सफल शुरुआत की है। बड़ी शिद्दत से नईम ने सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया है, वहीं लिजलिजी भावुकता से परे जीवन के कठोर यथार्थ को अपने नवगीतों में उभारा है। नईम के सानेट, गीत, गजल और नवगीतों में उनका मस्तमौला स्वभाव उनके भीतर का शिक्षक, उनकी दार्शनिकता और साफगोई दिखाई देती है। उन्होंने खूबसूरत कलाकृतियों/ आकृतियों के बहाने (जरिए) सामाजिक अभिलाषाओं, विसंगतियों और भावों को संवेदनहीन समाज के सामने रखा है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार के महाविद्यालयों एवं विद्यालयों में उनकी कविता पढ़ाई जा रही है। नईम की रचनाधर्मिता संवेदना का समाज पर इतना प्रभाव था कि उन पर पीएचडी व एमफिल की गई।



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