कश्मीरी कविता से आत्मीय परिचय

रहमान राही को मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार के बहाने एक टिप्पणी

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वरिष्ठ कश्मीरी कवि-आलोचक रहमान राही को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना सिर्फ कश्मीरी भाषा का ही सम्मान नहीं जिसकी लंबे समय से उपेक्षा की जाती रही है बल्कि उस कविता का भी सम्मान है जिसमें कश्मीरी जीवन अपने तमाम रंगों और खुशबुओं के साथ कई स्तरों पर धड़कता रहता है।

आखिर क्या कारण है कि इस बुजुर्ग कवि को बहुत पहले ही यह महसूस हो चुका था कि उन्हें अपने ख्यालों को अभिव्यक्त करने के लिए कश्मीरी जबान ही ज्यादा मुकम्मल लगती है। आखिर क्यों एक कवि अपनी भाषा में शरण लेकर अपने को व्यक्त करने के लिए बेचैन रहता है? जैसा कि इस बात का जवाब हर कवि अपनी भाषा में लिखकर-रचकर देता है ठीक उसी तरह रहमान राही ने भी कश्मीरी में कविताएँ लिखकर दिया है।

एक कवि अपनी ही भाषा से जीवन रस खींचकर अपनी कविता को सींचता हैं जिसमें उसके आसपास के लोगों का जीवन, उनके स्वप्न और आकांक्षाएँ व्यक्त होते हैं। जब उन्हें अकादमी पुरस्कार मिला था और यह उन्हें आज से लगभग 47 साल पहले मिला था तब उन्होंने कहा था -

मैं अनुभव करता हूँ कि मेरी अभिव्यक्ति के लिए कश्मीरी ही सही माध्यम है क्योंकि इसके शब्दों का समुद्र मेरे विचारों और भावनाओं को ज्यादा बेहतर ढंग से संप्रेषित करने में मददगार है'

  इसलिए आशा की जाना चाहिए कि रहमान राही के जरिए हम कश्मीरी कविता से परिचय करने की शुरुआत करेंगे। रहमान राही भी कह चुके हैं कि उनको मिले सम्मान से शायद बरसों से उपेक्षित कश्मीरी भाषा के साहित्य से आत्मीय परिचय की शुरुआत हो सकेगी।      
लेकिन यही महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने अपने को अपने लोगों के जीवन को कश्मीरी में अभिव्यक्त किया बल्कि उनका बड़ा काम तो यह है कि उन्होंने कश्मीरी अभिव्यक्ति को मॉडर्न इडियम दिया।

वे अपनी साहित्यिक सीमाओं को जानते थे और इसीलिए उन्होंने अपनी भाषा में कविता के उस इलाके में दखल दिया जहाँ वे कश्मीरी कविता को एक व्यवस्थित काव्यात्मक रूप दे सकें। उन्होंने एक बार कहा था कि मैं अपनी कविता में एक समूचे मनुष्य की बात करना चाहता हूँ लेकिन यह बात ठेठ स्थानीयता के संदर्भ में करना चाहता हूँ ताकि अधिक से अधिक लोग यह महसूस कर सकें कि मेरी कविता में उनके अनुभवों की बातें हैं।

यह स्वाभाविक ही था कि उनकी कविता में कश्मीर की खूबसूरती के बनस्बित वहाँ का अँधेरा ज्यादा है। पिछले कई सालों से कश्मीर के जो हालात बने हैं, वहाँ जो हिंसा और संघर्ष है उसकी एक साफ तस्वीर अपने काव्यात्मक रूप में उनकी कविता में मौजूद है। मिर्जा गालिब और मीर तकी मीर से लेकर रूसी कवियों से प्रभावित रही उनकी कविता में कश्मीरियों का वह द्वंद्व भी साफ देखा जा सकता है जिसमें वे कश्मीरी और राष्ट्रीयता के बीच अपनी पहचान के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

इसके साथ ही उनकी कविता का असल संघर्ष यह भी है कि उन्होंने अपनी सहज कल्पनाशीलता और रचनात्मक कौशल से कश्मीरी कविता को वह आधुनिक आँख दी जिसकी बदौलत उसे किसी भी भारतीय भाषा की कविता के समक्ष रखा जा सकता है।

रहमान राही तो इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि मैं कश्मीरी कविता को उतना ही समर्थ देखना चाहता हूँ जितनी विश्व की दूसरी भाषा की कविताएँ। जाहिर है इसमें अपनी भाषा के प्रति अगाध प्रेम भी झलकता है और अपनी भाषा के प्रति आत्मसम्मान भी।

यही कारण भी है कि रहमान राही ने आधुनिक कश्मीरी कविता को एक तरफ अरबी और उर्दू के असर से मुक्त किया वहीं दूसरी तरफ उसे ठेठ लोक संवेदना से भी मुक्त किया। उनकी कविता में कश्मीर के ज्वलंत यथार्थ का हाहाकारी चित्रण मिलता है जो उनकी आधुनिक काव्य भाषा में संवेदित है।
रहमान राही को ज्ञानपीठ मिलना एक बड़ा सवाल भी उठाता है कि हम भारतीय विदेशी भाषाओं के कविता परिदृश्य से तो खूब परिचित होते हैं, मसलन अमेरिकी, अफ्रीकी या पोलिश कविताओं, लेकिन हम अपनी ही भारतीय भाषाओं के कविता परिदृश्य से कितना परिचित हैं? आज यदि किसी कवि प्रेमी से पूछ लिया जाए कि वह उड़िया, असमी या कश्मीरी कविता के बारे में कितना जानता है तो हो सकता है वह बगले झाँकने लगे।
रवींद्र व्यास|
इसलिए आशा की जाना चाहिए कि रहमान राही के जरिए हम कश्मीरी कविता से परिचय करने की शुरुआत करेंगे। रहमान राही भी कह चुके हैं कि उनको मिले सम्मान से शायद बरसों से उपेक्षित कश्मीरी भाषा के साहित्य से आत्मीय परिचय की शुरुआत हो सकेगी।



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