'बादल बन बन आए साकी'

बच्चनजी सागर में

WD|
बच्चनजी और अन्य कवियों की तरफ पीठ देकर। मिश्रजी भारी भरकम, ऊँचे पूरे थे, कुर्ता-धोती पहनते थे, सिर पर गाँधी टोपी होती थी पर बाकी अदा में वे लंबरदार थे और अपनी लंबरदारी का अहसास उन्हें अहर्निश बना रहता था। श्रोता अपने प्रिय कवि को पूरा का पूरा- शिख से नख तक-नख से शिख तक देखना चाहते थे। उसमें मिश्रजी की उपस्थिति बाधा पहुँचा रही थी। 'मैं गाता हूँ, इसलिए जवानी मेरी है' का दूसरा बंद बच्चनजी ने पढ़ा-

तुम मेरे पथ के बीच लिए काया भारी-
भरकम क्यों जम कर बैठ गए, कुछ बोलो तो
क्यों तुमको छूता है मेरा संगीत नहीं
तुम बोल नहीं सकते तो झूमो, डोलो तो।

यह बंद बच्चनजी ने मिश्रजी के लिए शायद ही लिखा हो पर दर्शकों को लगा कि बच्चनजी ने खासतौर पर भारी काया लेकर जम कर बैठ गए पँक्ति द्वारा मिश्रजी को शालीन सलाह दी थी कि वे मंच को केंद्रीयता का परित्याग कर कहीं और खिसक लें। बच्चनजी ने केवल गीत के शब्दों से ही नहीं, अपने हस्त संचालन से भी उस भारी-भरकम उपस्थिति की ओर संकेत किया था। शायद न भी किया हो, हम लोगों को ही ऐसा लगा हो। जब मिश्रजी पर इन इशारों का कोई प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं दिया तो हूटिंग की आवाजें आनी शुरू हुई- अध्यक्ष राजनाथजी पाण्डेय के सामने बड़ा धर्मसंकट था- मित्र और अधिकारी के बीच में से एक का चुनाव करने की कुघड़ी सामने थी कि समस्या का अपने आप समाधान हो गया। किसी ने कंट्रोल रूम में जाकर बिजली का मेन स्विच ऑफ कर दिया- स्टेडियम अंधेरे में धुप्प।
राजनाथजी विरोधों का सामंजस्य करने की कला में निष्णात थे- वे जोर-जोर से बोल रहे थे- शांत रहिए- लाइट आने ही वाली है- पर श्रोताओं में सब्र नहीं था- वे बच्चनजी से बाहर चलकर खुले में कविता सुनाने का आग्रह कर रहे थे। सहसा शिवकुमारजी की आवाज आई- अब कवि सम्मेलन खुले में होगा- उन्होंने शायद बच्चनजी को मना लिया था, कवि के रूप में वे बच्चनजी के ठीक पीछे बैठे थे- वे बच्चन जी को लेकर स्टेडियम के विशाल मेन गेट की ओर बढ़ रहे थे- पता नहीं कहाँ से दो चार टार्च आ गए थे, सिगरेट पीने वालों के साथ-साथ माचिस थी ही- यहाँ-वहाँ तीलियों की रोशनी भी हो रही थी।
बच्चनजी शिवकुमारजी के साथ अब तक खुले में आ गए थे। हजार पाँच सौ की भीड़ उनके आगे-पीछे चल रही थी। इस बीच मावटा गिरने लगा था- पीछे अँधेरे भरे स्टेडियम में लौटना संभव नहीं था- बाहर से दो ढाई सौ गज दूर लार्ज लेक्चर थियेटर हॉल में रोशनी दिख रही थी- शिवकुमारजी के कदम उस ओर बढ़े। यूनियन के चौकीदार से उन्होंने हाल का ताला खुलवाया। बच्चन जी उस बैरकनुमा हाल में बने सीमेंट के चबूतरे पर खड़े हो गए थे। उस हाल में मुश्किल से दो ढाई सौ लोगों के खड़े होने लायक जगह थी। दो ढाई सौ श्रोता अंदर खड़े थे- बच्चनजी को बाहर लाइये- भीतर-बाहर का यह संघर्ष खत्म ही नहीं हो रहा था।
बच्चनजी ने बाहर खड़ी भीड़ की बेताबी देखी तो वे शिवकुमारजी के कान में कुछ फुसफुसाए। दोनों बाहर आए- बाहर सामने ही 20-25 कदम पर सड़क के उस पार बिजली का एक खंभा था- गोल घेरे से घिरा हुआ। हम लोग उसे सीट ऑफ विक्रमादित्य कहते थे। उस पर चालीस पावर का एक बल्ब टिमटिमा रहा था। बच्चनजी वहाँ ठिठके। शिवकुमारजी ने सामने पानी की विशाल टंकी की ओर संकेत किया जिसमें ऊपर पहुँचने के लिए सीमेंट की एक बड़ी पुख्ता सीढ़ी बनी थी। बच्चनजी उस ओर बढ़े और सीमेंट की नौवीं या दसवीं सीढ़ी पर चढ़कर बैठ गए। लीजिए, मंच तय हो गया। श्रोताओं की भीड़ अब तक पानी की टंकी के नीचे एकत्र हो गई थी। किसी ने कुछ नहीं कहा, किसी ने कोई फरमाइश नहीं की, प्रकृति ने 'मधुशाला' के काव्य पाठ का पूरा बैक ड्राप तैयार कर दिया था। बिना माइक के चारों ओर बच्चनजी की स्वर लहरी गूँज रही थी।
मृदु भावों के अँगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहिले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहिले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला

तालियाँ बज रही थी, श्रोता झूम रहे थे- अब किसी संचालक की आवश्यकता नहीं थी, कवि और रसिक जनों के बीच किसी भी मध्यस्थता का क्षण बीत चुका था। अँधेरे-उजाले की कोई चिंता नहीं रह गई थी। स्थान की कमी का कोई रोना नहीं रह गया था- पानी बरस रहा था- बच्चनजी भीग रहे थे, श्रोता सरोबार थे, आकाश से रस वर्षा हो रही थी, धरती रसपान कर रही थी। बच्चनजी 'मधुशाला' की 30वीं रुबाई तक पहुँच गए थे।
सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिन्धु बने घट, जल हाला
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा, रिमझिम-रिमझिम कर
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला

मधुशाला अब कविता नहीं थी, वह जीवित, स्पंदित सत्ता हो उठी थी, बादल साकी बन चुके थे, भूमि मधु के प्याले में रूपांतरित हो चुकी थी, मदिरा रिमझिम बरस रही थी। विराट प्रतीक! विराटता का साक्षात बिंब। 'जमे हुए थेपीने वाले, जगी हुई थी मधुशाला' बधानजी सुना रहे थे। जब उन्होंने मधुशाला की यह रुबाई लिखी होगी।
तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला
सीधा करके भर दी जाए, उसमें सागर- जल हाला
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से, विश्व बने यह मधुशाल

तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि सागर में तरुणों के समुदाय के बीच उनकी यह रुबाई श्रव्य और दृश्य का- सूँ ए लूमियेर का रूप धारण कर जीवित हो उठेगी और सागर को, सागर के विश्वविद्यालय को नई अर्थवत्ता प्रदान करेगी।
उस रात हालत यह थी कि हम लोग जिस ओर भी आँख उठाते, हमें बच्चन दिखाई देते, हमारे कानों में केवल 'मधुशाला' की पँक्तियाँ आ रही थीं। श्रवण नयनमय नयन श्रवणमय होने से उस रात कोई उलझन नहीं हुई थी।

मधुशाला की अंतिम रुबाई :
बड़े-बड़े नाजों से मैंने पाली है साकी बाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,मान-दुलारों से ही रखना, इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व! तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूं मधुशाला।



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