क्षतशीश किन्तु नतशीश नहीं

बच्चन जी बैंकुठपुर में

ND|
दार्शनिक का पथ बाण का पथ होता है जो सीधा चलता है, बिना आसपास की जगह घेरे हुए, कवि का मार्ग सर्प का मार्ग होता है- अपने आस-पास को घेरता हुआ, परिवेश को अपने कुंडल में लपेटता हुआ। बच्चनजी का मन बचपन से ही सर्पकुंडल को समर्पित हो चुका था।

उनके हस्ताक्षरों में इसी का संकेत है, उस चित्र के बालों में यही सर्पकुंडल है, उनकी मधुशाला में प्रत्येक पँक्ति सर्प की काया के समान सुसंबद्ध है- आदि से अंत तक समग्र, सर्प के समान गतिमय, पिछला शब्द अगले शब्द को गतिशील बनाता हुआ, सर्प की त्वचा की तरह चमकता हुआ, स्निग्ध, आकर्षक। यह सब तो बाद में समझ आया। सच तो यह है कि उस समय 43 या 44 में बैकुंठपुर के अपने दिनों में मैं और मेरे मित्र बच्चनजी के केश कलाप पर और उनके सर्पकार हस्ताक्षरों पर ही रीझे रहे।
'इस पार प्रिये ! तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा'- से प्रारंभ होनेवाली कविता हम लोगों की समझ में कुछ उड़ती ही आई थी पर उसका एक फौरी उपयोग हम लोगों ने खोज लिया था। सिविल लाइंस स्थित हमारे क्वार्टर के ठीक बगल में एक राय साहब रहते थे। कचहरी में सुप्रिंटेंडेंट थे, शायद बिहार के थे, प्रायः अकेले ही रहते थे। जिन दिनों बच्चनजी की यह कविता हमारे हाथ लगी थी। उनकी बिहारी अर्द्धांगिनी पतिगृह पधारी हुई थीं। उनके आते ही शांत, एकांत रहने वाले राय साहब का क्वार्टर धूम-धड़ाके से भर गया था- सुबह-शाम जब देखो तब वहाँ प्रक्षेपास्त्र चल रहे हैं- गाली-गलौज हो रहा है -राय साहब घर से निकलते तो तौलिए से सिर या मुँह ढँके हुए।
सिर पर उठे गूमटों को छिपाने के लिए या चेहरे पर उभरी खरोंचों को छिपाने के लिए। राय साहब की नवागत पत्नी को किसी ने यह भेद दे दिया था कि उनके पति महोदय उनकी अनुपस्थिति की अवधि में किसी मधु नामक बुतकरनि से प्रेम फरमाते हैं। मधु को तो उन्होंने फौरन ही काम से अलग कर दिया था पर 'मधु' का विष उनकी रग-रग में व्याप्त हो गया था। बच्चनजी की कविता को हम लोगों ने एक नया संदर्भ दे दिया था-इस उपक्रम में कविता को थोड़ा रूपांतरण जरूर करना पड़ता था। जब भीतर प्रक्षेपास्त्र चल रहे होते और राय साहब अपना सिर या पीठ बचाने के लिए किसी शरण स्थली की तलाश में होते तो हम लोग- मेरे बड़े भाई साहब कृष्णकुमार, सहपाठी बाल कृष्ण, बाल सखा जीतू और मैं- राय साहब के क्वार्टर के सामने खड़े होकर कोरस गाने लगते- 'इस पार प्रिये! चिमटा बेलन है, उस पार न जाने क्या होगा- उस पार मरम्मत का मेरी सामान न जाने क्या होगा।' बीच-बीच में 'इस पार प्रिये! तुम हो, मधु है' भी दोहराते, ताकि बच्चनजी की कविता अपने मूल रूप से दूर न जाने पाए।
अपने कोरस को स्थायी महत्व प्रदान करने के लिए मैंने उसे हस्तलिखित पत्रिका- बालजीवन में गौरवपूर्ण स्थान देकर प्रकाशित भी कर दिया था। इस पर पिताजी ने मेरे काम भी खींचे थे कि बड़े लोगों के साथ ऐसी हरकत ठीक नहीं है। पर पिताजी हम हमेशा तो घर में रहते नहीं थे और राय साहब के यहाँ प्रक्षेपास्त्रों के चलने का कोई समय मुकर्रर नहीं था। जब राय साहब अपनी पत्नी के प्रक्षेपास्त्र चालन से और हमारे कोरे गायन से तंग आ गए तो वे अपनी सहधर्मिणी को मायके गढ़वा रोड (बिहार) छोड़ आए थे। पर कविता के प्रभाव से हम लोग अभिभूत थे और बच्चन जी- अपरिचित बच्चन जी- हमारे अपने बन गए थे।
उनसे हमारा संबंध बड़े और छोटे का नहीं, कवि और पाठक का नहीं, शिक्षक और शिष्य का नहीं, दोस्त और दोस्त का बन गया था। यह आत्मीयता, समय के साथ, समझदारी बढ़ने के साथ, बढ़ती गई थी। हमें यह लगता चला गया था कि बच्चनजी की कविता जीवन के बीच खड़े होकर जिन्दगी जीने वाली की और जिन्दगी को समझने-बूझने वालों के लिए हैं। जीवन की आपाधापी से जूझने वाले कवि की कविता, जीवन की रोजमर्रा की भाषा में लिखी जानेवाली कविता, जैविक स्तर से, प्राणों के, मार्मिक अनुभूतियों के स्तर में लिखी गई कविता, अपने आप तरुण पीढ़ी की कविता बन गई थी। 'मैं बोला, जो मेरी नाड़ी में डोला, जो रग में घूमा'- बच्चनजी का ही सत्य नहीं था, उनके पाठकों का भी सत्य था।
बच्चनजी की कविता समझने के लिए मुझे कभी भी शब्दकोश खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी, कविता पढ़ते जाइए, अर्थ खुलता जाएगा, उनका मर्म आपका अपना मर्म बनता चला जाएगा। बच्चन की कविता हमारी निराशा में हमारी पीठ सहलाने वाली, पस्ती के क्षणों में हमारे कंधे थपथपाने वाली, दोस्त की तरह आँसू पोंछने के लिए रूमाल बढ़ाने वाली कविता थी। यदि वह यह न भी करती तो भी यही लगता ही था कि इतने बड़े संसार में नीड़ से छूटा हुआ, दुःख से टूटा हुआ दुर्भाग्य से लूटा हुआ, मैं अकेला ही नहीं हूँ और भी बहुत से हैं।' यह भाव बच्चनजी को दार्शनिक या उपदेशक नहीं, मित्र बनाता था।
हिन्दी में बच्चनजी ही कवि कम, अपने दोस्त ज्यादा लगे थे। बच्चनजी के हस्ताक्षरों की तरह, बच्चनजी की कविता भी अपने पाठकों या श्रोताओं को गलबहियों में लपेट लेती है। आधुनिक हिन्दी की कविता के सौ- डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में ऐसा और कवि के साथ नहीं होता।

जब बच्चनजी ने पानी की टंकी की उस सीढ़ी के नौवें या दसवें पायदान पर बैठे-बैठे उस झूम रही रसिक मंडली को सुनाई तो मुर्गा बांग दे रहा था और गंभीरिया की घाटी की ओर के बादल सूर्य किरणों के चुंबन से मधु के रंग केहो रहे थे। पानी अभी भी बरस रहा था। भीगे तो सभी थे- बच्चनजी भी, शिवकुमारजी भी और हम सब श्रोता भी। थका शायद कोई नहीं था। 'मधुशाला' की अंतिम पंक्ति में आए 'विश्व' को हम लोगों ने विश्वविद्यालय का संक्षिप्त रूप माना था और बच्चनजी की घोषणा को शब्दशः स्वीकार करते हुए 'मधुशाला' को अपना मान लिया था।
इस कवि सम्मेलन के लिए बच्चनजी को 250/ दिए गए थे- उस समय तक सागर आए कवियों को दी गई सर्वाधिक राशि। नीरज एक साल पहले ही आए थे- उन्हें मानदेय के रूप में केवल 51/ कि राशि दी गई थी।



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