मोदी की मदद करने वाली रिपोर्ट

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- कुलदीप नैयर
जब के रूप में चर्चित प्रसंग में न्यायमूर्ति नानावटी आयोग की जाँच आयोग का मात्र एक ही भाग पेश किया गया तो मुझे दाल में कुछ काला-सा लगा था। जिस समय पेश की गई, उस अवसर से संबंधित एक फोटोग्राफ में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की आल्हादित मुद्रा को देखकर मैंने बहुत-कु छ समझ लिया था। यह स्पष्ट था कि मोदी बेदाग घोषित कर दिए गए हैं।


भारी आलोचना के बाद नानावटी ने स्पष्टीकरण दिया है कि उनकी यह प्रथम रिपोर्ट कोच के जलाए जाने मात्र तक ही सीमित है। उन्होंने कहा है कि उनके द्वारा मोदी अथवा उनकी सरकार को 'क्लीन चिट' नहीं दी गई है और वह अभी भी गोधरा कांड के बाद हुए दंगों पर कार्यरत है। नानावटी आयोग, जिसकी अवधि सोलह बार बढ़ाई जा चुकी है, उसने एक अधूरी रिपोर्ट क्यों पेश की? इस बारे में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई? आयोग पर कोई दबाव नहीं था। सच है कि भाजपा और मोदी ऐसा ही चाहते थे। किंतु मुझे यह समझ नहीं आ पा रहा है कि नानावटी ने ऐसा क्यों किया? वे जानते हैं कि लगभग दो हजार मुसलमानों के मारे जाने को कोई भी क्षम्य नहीं मान सकता, उनका आयोग भी नहीं।

यह स्पष्ट था कि नानावटी ने कमोबेश मोदी और भाजपा के 59 कारसेवकों को कोच में जीवित जलाए जाने के बाद शीघ्र ही मुसलमानों के संहार के बारे में जो आड़ प्रस्तुत की थी, उसे ही नानावटी ने दोहराया है। नानावटी ने जो रिपोर्ट जारी की है, वह कुछ अलग नहीं है। वे भी यही कहते हैं कि आग लगना- यह स्थानीय मुसलमानों का एक 'पूर्व नियोजित षड्यंत्र' था। न्यायमूर्ति नानावटी ने किसी भी धार्मिक अथवा राजनीतिक संगठन की संबद्धता को नकारा है और भाजपा, बजरंग दल तथा ऐसे ही अन्य को दोषमुक्त किया है।

नानावटी ने जो विवरण दिया है, वह सर्वोच्य न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यूसी बनर्जी ने जो कहा है, उसके सर्वथा उलट है। न्यायमूर्ति बनर्जी के अनुसार (उन्हें रेलवे ने जाँच कार्य हेतु नियुक्त किया था) आग कोच के बाहर से नहीं लगाई गई थी अपितु भीतर से ही लगी थी, चाहे यह दुर्घटना हो अथवा इरादतन। बनर्जी ने नानावटी की रिपोर्ट के बाद भी अपने निष्कर्षों को दोहराया है।
न्यायमूर्ति बनर्जी की रिपोर्ट और न्यायमूर्ति नानावटी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट विरोधाभासी हैं। इससे न्यायपालिका को ख्याति नहीं मिल सकती। यदि किसी अधीनस्थ न्यायालय के स्तर पर ऐसी बात होती तो उच्च न्यायालय उससे पूछताछ कर सकता था। मैं इस सिलसिले में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता किंतु जब मामले का संबंध सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से है तो मुझे दुरभिसंधि-सी ही महसूस होती है।
यह स्पष्ट है कि नानावटी गुजरात का पक्ष लेना चाहते थे, इस राज्य ने ही उन्हें जाँच आयोग का प्रमुख नियुक्त किया था। वे जानते हैं कि वह गोधरा के बाद की रिपोर्ट में राज्य की आलोचना से किनारा नहीं कर सकेंगे। क्या उन्होंने दोनों घटनाओं को जानबूझकर पृथक तो नहीं किया, जबकि दोनों वस्तुतः एक ही हैं? क्योंकि प्रथम रिपोर्ट राज्य के पक्ष में है, उन्होंने उसे आने दिया, मानो वह दूसरी घटना से स्वतंत्र हो। कानूनी तौर पर रिपोर्ट को विभिन्न भागों में जारी करने में कुछ भी गलत नहीं है, किंतु नैतिक दृष्टि से यह ठीक नहीं है, क्योंकि अब लोगों से आंशिक रिपोर्ट के आधार पर ही अपनी सोच तय करने की आशा है।
मुझे कुछ ऐसा महसूस होता है कि गोधरा के बाद की रिपोर्ट जिसमें मोदी और गुजरात प्रशासन को दोषी ठहराया जाएगा ही और इस धारणा को भी वह स्पष्ट करेगी कि राज्य के (नृ) जातीय लिहाज से सफाए की पूर्व योजना थी, वह अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव के बाद जारी होगी। जाने या अनजाने में नानावटी ने मोदी और उनकी पार्टी की सहायता की है।

मुझे 1984 में हुए उन दंगों के बारे में न्यायमूर्ति नानावटी द्वारा अपनी रिपोर्ट पेश किए जाने से पहले, जिनमें केवल दिल्ली में ही तीन हजार लोग मारे गए थे, उनसे हुई बातचीत का स्मरण हो आता है। उन्होंने मुझसे कहा था कि दिल्ली में जो कुछ हुआ, भारत में कहीं भी हो सकता है। क्योंकि पुलिस कोई सीमा नहीं जानती और राजनीतिज्ञों के कोई मानदंड नहीं हैं।
उन्होंने गुजरात में हुई हत्याओं की जो जाँच वे कर रहे थे, उस पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि मैंने गुजरात में भी वही पैटर्न देखा है। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने दिल्ली और गुजरात की घटनाओं के बीच अनेक समानताएँ देखी हैं और राजनीतिज्ञों अथवा अधिकारियों में से किसी के लिए उनके पास अच्छा कहने को कुछ नहीं है। अतएव जब वे मोदी को, उनकी मंत्रिपरिषद और पुलिस अधिकारियों को क्लीनचिट देते हैं, तो मेरी समझ में नहीं आ पाता।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष, पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने एक पत्र जारी किया है-जो यह दर्शाता है कि उन्होंने नानावटी को सतर्क किया था। अपने बयान में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा है कि नानावटी की क्लीनचिट सत्य से परे है।

1984 के दंगों पर रिपोर्ट में नानावटी ने अपनी निस्सहायता व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था कि 20 वर्ष के बाद आगे कुछ करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, हत्यारों को कसने के लिए भी कुछ नहीं। मैं आशा करता हूँ कि गोधरा कांड के बाद की हत्याओं के बारे में वे वैसा नहीं करेंगे और एक बार पुनः अपनी निस्सहायता की बात नहीं कहेंगे। 1984 की हत्याओं को हुए तो तब दो दशक बीत चुके थे, जब न्यायमूर्ति नानावटी से जाँच करने को कहा गया था। गुजरात में हुई हत्याएँ तो अभी सिर्फ छः वर्ष पूर्व ही हुई थीं। राष्ट्र उनसे आशा करता है कि वे बेहतर काम करेंगे।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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