बिकी कलम नहीं बोल सकती बेबाकी से

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प्रेमचंद- इशारा 'कुछ और' के लिए भी किया है। पत्नी- तो फिर ले लीजिए वह भी। इतना क्यों सोच रहे हैं? प्रेमचंद- ले तो लूँ, लेकिन तब मैं आम आदमी का न रहकर सरकार का 'पिट्ठू' बन जाऊँगा। पत्नी- पिट्ठू? प्रेमचंद- हाँ, अभी तक तो मैं आम आदमी के लिए लिखता रहा हूँ, परन्तु 'रायबहादुर' का खिताब स्वीकार कर लेने के बाद मुझे सरकार के लिए लिखना पड़ेगा। पत्नी- ऐसी बात है, तो फिर उन्हें क्या जवाब दोगे? पत्नी के स्वर में अपने मन की बात के प्रति सहमति का भाव देखकर वे बोले- ऊँह, लिख दूँगा कि जनता ने मुझे कब से 'रायबहादुर' का खिताब दे रखा है, मुझे अब सरकारी खिताब हासिल करने की कोई चाह नहीं है।

  मुंशी प्रेमचंद ने लिखा भी है- 'हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो।      
दोस्तो, कहते हैं 'जब बेच दोगे कलम, फिर क्या बचेगा लेखनी में दम।' यही कारण था कि प्रेमचंद ने कभी अपनी कलम का सौदा नहीं किया। इसके चलते ही उस समय के अनेक राजे-रजवाड़ों के उनकी रियासत में आकर रहने और वजीफा स्वीकारने के प्रस्तावों को उन्होंने अपनी विषम आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद ठुकरा दिया था और अपनी तथा आम लोगों के मन की बात को कलम के माध्यम से बेबाकी से अभिव्यक्त करते रहे। इसलिए यदि आप भी बेबाक तरीके से अपने मन के भाव अपनी कलम के जरिये व्यक्त करना चाहते हैं तो आपको भी इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि कहीं आप किसी छोटे-मोटे फायदे या सम्मान के लिए अपनी कलम का सौदा न कर बैठें।

दूसरों के उपकार के बोझ तले दबी कलम का असर आपकी लेखन में भी दृष्टिगोचर होने लगता है। तब उसमें पहले जैसी धार नहीं रहती। दूसरी ओर, प्रेमचंद दिखावा नहीं करते थे। एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा- मुंशीजी, आप कैसे कागज पर और कौन-सी कलम से इतनी महान रचनाएँ गढ़ते हैं। इस पर वे हँसते हुए बोले- ऐसे कागज पर जनाब, जिस पर पहले से कुछ न लिखा हो और ऐसे पेन से जिसका निब न टूटा हो। फिर गंभीरतापूर्वक बोले- भाईजान! ये सब 'चोंचले' हम जैसे कलम के मजदूरों के लिए नहीं हैं।

ऐसे थे मुंशी प्रेमचंद। एक जानदार व्यक्तित्व, एक शानदार लेखक। जितने सहज और सरल वे खुद थे, उतनी ही सहजता और सरलता उनके लेखन में भी थी। उनकी भाषा शैली ऐसी थी कि सामान्य पाठक भी उनकी बात को आसानी से समझ जाए। वे दिल से लिखते थे। वैसे भी कोई भी बात तभी असरकारक होती है, जब वह दिल से कही या लिखी जाए। मुंशी प्रेमचंद ने लिखा भी है- 'हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो। जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।'

और अंत में, आज मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। इस अवसर पर कलमकारों को उनसे प्रेरणा लेकर यह संकल्प लेना चाहिए कि वे मुंशीजी की तरह किसी ऐसे व्यक्ति का अहसान नहीं लेंगे, जिसका सीधा असर उनकी लेखनी पर पड़ सकता हो। ऐसे में अहसान के तले वे दबते हैं और जान कलम की निकल जाती है। तब आप सामने वाले का पिट्ठू बनकर उसकी बात को मिट्ठू की तरह दोहराते हैं यानी आपकी कलम उसकी भाषा बोलने लगती है।

मनीष शर्मा| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (21:03 IST)
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एक बार उत्तरप्रदेश के गवर्नर माल्कम हेली की ओर से को एक संदेश पहुँचा, जिसे पढ़कर वे चिंता में डूब गए। यह बात उन्होंने किसी को नहीं बताई, लेकिन उनके चेहरे के बदले हुए भाव उनकी पत्नी से नहीं छिप सके। वे बोलीं- क्या बात है? अचानक चुप-चुप क्यों रहने लगे हो? प्रेमचंद- गवर्नर मुझे 'रायबहादुर' का खिताब देना चाहते हैं। पत्नी- तो इसमें चिंता की क्या बात है? ले लीजिए 'रायबहादुर' का खिताब। लेकिन वे सिर्फ खिताब ही देना चाहते हैं या फिर कुछ और भी देंगे?
आप चाहकर भी उसकी गलत बातों को उजागर नहीं कर पाते, उसके विरुद्ध लिख नहीं पाते। वैसे भी जब आप किसी भी व्यक्ति से छोटा-सा भी अहसान ले लेते हैं, तो आप मानें न मानें, आपको उसका बदला किसी न किसी रूप में चुकाना ही पड़ता है। इसलिए अहसान से बचकर रहें और शान से जिएँ। अरे भई, गरजने वाली कलम अचानक मिमियाने क्यों लगी?



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