संस्था की छवि है तो आपकी छवि है

मनीष शर्मा|
की कल जयंती है। एक बार वे जापान की यात्रा पर थे। वहाँ विभिन्न शहरों में उनके कई कार्यक्रम थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वे ट्रेन से जा रहे थे। रास्ते में उनकी इच्छा फल खाने की हुई।


जब गाड़ी अगले स्टेशन पर रुकी तो वहाँ अच्छे फल नहीं मिले। इस पर स्वामीजी ने स्वाभाविक-सी प्रतिक्रिया कर दी कि 'लगता है कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।' उनकी यह बात एक सहयात्री जापानी युवक ने सुन ली, लेकिन उसने कहा कुछ नहीं। जब अगला स्टेशन आया तो वह फुर्ती से उतरा और कहीं से एक पैकेट में ताजे-ताजे मीठे फल ले आया।
स्वामीजी ने उसे धन्यवाद दिया और कीमत लेने का आग्रह किया, लेकिन उस युवक ने मना कर दिया। जब स्वामीजी ने कीमत लेने पर ज्यादा जोर दिया तो वह बोला कि मुझे कीमत नहीं चाहिए। यदि आप देना ही चाहते हैं तो बस इतना आश्वासन दे दीजिए कि अपने देश लौटकर किसी से यह मत कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इससे हमारे देश की छवि खराब हो सकती है। उसकी भावना से स्वामीजी गद्गद् हो गए।

दोस्तो, अपने देश के प्रति इसी लगाव की बदौलत आज जापान जैसा एक छोटा-सा देश आर्थिक क्षेत्र में विश्व की एक शक्ति है। हमारे यहाँ भी इस तरह की भावना के लोग हैं, लेकिन केवल मुट्ठीभर।


सोचें कि यदि यह भावना अधिकतर लोगों में आ जाए तो यह देश कहाँ पहुँच सकता है। लेकिन हमारे यहाँ तो ज्यादातर जापान से उल्टा होता है। जैसे कि यदि यही घटना किसी विदेशी संत के साथ भारत में घटी होती तो कोई युवक उन्हें अच्छे फल तो नहीं देता, बल्कि यहाँ और क्या-क्या अच्छा नहीं मिलता है, इस बात की जानकारी जरूर दे देता, फिर चाहे इससे देश की छवि कितनी ही खराब क्यों न हो जाए।
दूसरी ओर, बहुत से लोग अक्सर अपनी कंपनी या संस्था की ही निंदा दूसरों के सामने करने लगते हैं। निंदा करते समय उन्हें इतना भी ध्यान नहीं रहता है कि ऐसा करके वे न केवल अपनी संस्था की छवि को नुकसान पहुँचा रहे हैं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से वे अपनी छवि भी बिगाड़ रहे हैं, क्योंकि संस्था की छवि से उनकी छवि भी जुड़ी होती है। इस तरह वे 'उसी डाल को काट रहे होते हैं, जिस पर वे बैठे हैं।'



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