ऑफ बीट सिनेमा का वर्ष - 2007

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इसके बाद भारतीय मूल की, लेकिन विदेशों में बस गई दो महत्‍वपूर्ण महिला निर्देशकों की फिल्‍में आसपास ही प्रदर्शित हुईं। मीरा नायर की 'द नेमसेक' और दीपा मेहता की 'वॉटर' ऑफ बीट फिल्‍मों की कड़ी में अगले बड़े नाम थे। दो फिल्‍में अँग्रेजी में थीं। झुंपा लाहिड़ी के उपन्‍यास पर आधारित 'द नेमसेक' 'सलाम बॉम्‍बे' के बाद मीरा नायर की सबसे सशक्‍त फिल्‍म थी।

तमाम विवादों के चलते 'वॉटर' को भले ही‍ दर्शक ज्‍यादा मिले हों, लेकिन फिल्‍म कई मोर्चों पर कमजोर हो गई थी। लेकिन इसके बावजूद ये महान भारतीय संस्‍कृति का चश्‍मा पहने लोगों को उनके समाज का एक अँधेरा, स्‍याह चेहरा तो दिखाती ही है। गौतम घोष की ‘यात्रा’ भी इसी वर्ष प्रदर्शित हुई।

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ऐश्‍वर्या राय अभिनीत और एक सच्‍ची कहानी पर आधारित फिल्‍म प्रोवोक्‍ड को भी लोगों ने पसंद किया। महात्‍मा गाँधी पर बनी फिल्‍म ' गाँधी माय फादर' के साथ एक बार फिर महात्‍मा से जुड़ी बहसें और विचार सरगर्मियों में आ गए। गाँधी पर वैसे भी हिंदी सिनेमा में उतना काम नहीं हुआ है, जितना कि किया जाना चाहिए था। गाँधी पर बनी एकमात्र जबर्दस्‍त फिल्‍म का श्रेय भी हॉलीवुड के खाते में दर्ज है।

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विशाल भारद्वाज और मधुर भंडारकर सरीखे निर्देशकों ने कमर्शियल और कला सिनेमा के बीच एक कड़ी का काम किया है। 'ट्रैफिक सिगनल' और 'ब्‍लू अम्‍ब्रेला' इसी कड़ी की फिल्‍में हैं। 'ट्रैफिक सिगनल' मधुर भंडारकर की सबसे बेहतरीन फिल्‍म कही जा सकती है और 'ब्‍लू अम्‍ब्रेला' विनोद भारद्वाज की।

इसके अलावा इस वर्ष रीमा कागती की 'हनीमून ट्रैवल्‍स प्रा.लि.', अनुराग बासु की 'लाइफ इन ए मैट्रो’, सागर बेल्‍लारी की ‘भेजा फ्राय’, आर. बल्‍की की ‘चीनी कम’ और वर्ष के अंत में रिलीज हुई सुधीर मिश्रा की ‘खोया-खोया चाँद’ इस कड़ी में कुछ और फिल्‍में हैं।

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कुल मिलाकर ठेठ कला सिनेमा और सिनेमा के माध्‍यम से नए प्रयोगों के लिहाज से वर्ष 2007 काफी उर्वर रहा। इन फिल्‍मों ने आने वाले समय में भी ऐसी तमाम बेहतरीन और लीक से हटकर जीवन को देखने वाली और फिल्‍मों का रास्‍ता खोला है।



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