अपनी भाषा, अपनी लिपि : जानिए क्यों है जरूरी

WD|
भाषा एवं लिपि की विविधता और एकरूपता
- जितेन्द्र वेद  
भारत जैसी बहुभाषी व बहुलिपि वाले देश में भाषाई समस्या के मद्‍देनजर कई बार कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल से कच्छ तक एक ही लिपि अपनाने की बात कही जाती रही है। राष्ट्रीय एकीकरण और संवाद के सरलीकरण के दृष्टिकोण से प्रथम दृष्ट्‍या यह सोच सही मानी जा सकती है। शायद इसीलिए इस देश के महान सपूतों ने अपनी लेखनी, अपनी वाणी के माध्यम से इस बात का पुरजोर समर्थन किया है। 
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'हरिजन सेवक' में लिखा है 'बंगाली में लिखी हुई गीतांजलि को सिवा बंगालियों के और पढ़ेगा ही कौन'। यह निर्दयता नहीं तो और क्या है कि देवनागरी के अतिरिक्त तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया तथा बंगाली इन छ: लिपियों को सीखने में दिमाग खपाया जाए।
 
आचार्य विनोबा भावे के अनुसार देवनागरी लिपि हमारे लिए रक्षा कवच है। इसी बात को समझाते हुए वे लिखते हैं 'यदि हम सारे देश के लिए देवनागरी को अपना लें तो हमारा देश बहुत मजबूत हो जाएगा, फिर तो देवनागरी ऐसा रक्षा कवच सिद्ध हो सकती है, जैसी कोई भी नहीं हो सकती।'
 
पंडित जवाहरलाल नेहरू का मत थोड़ा-सा जुदा है, वे लिखते हैं 'देवनागरी को समूची भारतीय भाषाओं के लिए अतिरिक्त लिपि के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए। इससे एक राज्य के निवासी दूसरे राज्य की भाषाएँ आसानी से सीख सकेंगे, क्योंक‍ि असली कठिनाई भाषा की उतनी नहीं है, जितनी लिपि की है।' पंडितजी का वक्तव्य उनकी राजनीतिज्ञ-कूटनीतिज्ञ की छवि से बहुत कुछ मेल खाता है। एक शब्द 'अतिरिक्त' का प्रयोग कर उन्होंने मध्यम मार्ग अपना लिया है।> > एक अन्य महान् व्यक्तित्व दयानंद सरस्वती कहते हैं - 'मेरे नेत्र तो वे दिन देखना चाहते हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक नागरी अक्षरों का ही उपयोग और प्रचार होगा।'
 
जाहिर है स्वामीजी की सोच वर्तमान भारत में देवनागरी के उपयोग के बजाय तत्कालीन भारत जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के बारे में भी रही होगी। कुछ पाश्चात्य दृष्टिकोण वाले विद्वतजन रोमन लिपि के उपयोग के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हैं। वे उपमहाद्वीपीय सोच के बजाय अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता के बारे में ज्यादा चिंतित हैं।



और भी पढ़ें :